मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ जाती दिख रही कांग्रेस संगठन की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम खुद हरदा को भी रास आ रही है। देखने में भले ही यह उलटबांसी लगे पर राजनीतिक हालात बता रहे हैं कि संगठन और सरकार के बीच बैर भाव से दोनों के हित भी सध रहे हैं।
मुख्यमंत्री हरीश रावत को एकला चलो रे में आसानी होगी और संगठन मंत्रियों पर दबाव बनाने में कामयाब होगा।
मुख्यमंत्री हरीश रावत के सामने 2017 की चुनौती है। अपने विधायकों की नाराजगी भी। कुछ रूठे और कुछ मना लिये जाने की आस में बैठे मंत्री भी हैं। संगठन के तीखे तेवर अलग। ठीक यही हाल किशोर का भी है।
कांग्रेस में बगावत के समय पूरे संगठन को मुख्यमंत्री के पक्ष में खड़ा करने के बाद भी किशोर नहीं जानते कि 2017 के चुनाव में टिहरी का चुनाव लड़ भी पाएंगे या नहीं। टिहरी में पीडीएफ के मंत्री दिनेश धनै का कद बढ़ाकर रावत ने जले पर नमक और छिड़क दिया।
किशोर के पास पूरे कारण हैं कि संगठन के नेताओं को यह बताते चलें कि सरकार से उनकी बन नहीं रही है। ऐसे में संगठन के नेता किस मुंह से किशोर से कहें कि सरकार से यह काम कराओ। किशोर का असंतुष्ट कांग्रेस संगठन के नेताओं का एक सरदर्द तो कम हुआ।
पीसीसी की जिस बैठक में पूर्व सांसद महेंद्र पाल ने कांग्रेस अगेंस्ट करपशन विभाग के गठन का प्रस्ताव रखा, उसमें खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत मौजूद थे। संगठन के एक-एक कदम से मुख्यमंत्री वाकिफ हैं, पर बोल कुछ नहीं रहे हैं।
जाहिर है कि यह मुहिम रावत को भी रास आ रही है। खुदमुख्यमंत्री हरीश रावत इस समय अपने मंत्रियों से ज्यादा घिरे हुये हैं। खनन से लेकर ट्रांसफर पोस्टिंग तक के मामले उनके लिये सरदर्द बने हुये हैं। ऐसे में संगठन की मुहिम अगर मंत्रियों को ही घेर ले तो गुरेज किसे होना चाहिये।
संगठन की भी ज्यादा शिकायत मंत्रियों से है। कांग्रेस संगठन के बार-बार बुलाने पर भी मंत्री कांग्रेस भवन की ओर रुख नहीं करते। कांग्रेस के विधानसभा सम्मेलनों में भी मुद्दा उठा था कि कार्यकर्ताओं को तवज्जो नहीं मिल रही है।
ऐसे में भ्रष्टाचार के मामले में मंत्री घिरे तो हर्ज ही क्या है। जाहिर है कि मंत्रियों के लिए यह मुहिम रेड अलर्ट भी साबित हो सकती है।