सनातन धर्म की कालगणना केवल तिथियों और महीनों का गणित नहीं, बल्कि मानव जीवन को धर्म, संयम और आत्मोन्नति की दिशा देने वाली दिव्य व्यवस्था है। इन्हीं दिव्य व्यवस्थाओं में “पुरुषोत्तम मास” अथवा “अधिकमास” का विशेष स्थान है।
वर्ष 2026 में 17 मई से 15 जून तक यह पावन पुरुषोत्तम मास रहेगा। शास्त्रों में इसे भगवान श्रीहरि विष्णु का स्वरूप माना गया है।
अधिकमास क्या है?
जब किसी चन्द्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती, तब वह “अधिकमास” कहलाता है। सामान्यतः लगभग 32 माह 16 दिन के अंतराल पर यह मास आता है। लोक व्यवहार में इसे पुरुषोत्तम मास, मलमास अथवा अधिकमास भी कहा जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है
अधिकमास में फल की इच्छा से किए जाने वाले मांगलिक एवं काम्य कर्मों का त्याग करना चाहिए। यह मास बाह्य उत्सवों की अपेक्षा आंतरिक साधना, तप, जप और आत्मचिन्तन के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
क्यों नहीं किए जाते मांगलिक कार्य?
सनातन परंपरा में विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत, नवीन प्रतिष्ठा, प्रथम यात्रा आदि कार्य शुभ मुहूर्तों में सम्पन्न किए जाते हैं। अधिकमास में इन कार्यों को स्थगित रखने की परंपरा इसलिए बनी कि मनुष्य कुछ समय सांसारिक उत्सवों से हटकर आत्मिक उन्नति पर ध्यान दे सके।
इस अवधि में विवाह, मुण्डन, गृहप्रवेश, देवप्रतिष्ठा, नवीन संस्कार आदि वर्जित माने गए हैं।
किन्तु यह भी ध्यान देने योग्य है कि आवश्यक कार्य, जीवनोपयोगी क्रियाएँ तथा आपात परिस्थितियों से जुड़े कार्य निषिद्ध नहीं होते। शास्त्र व्यवहार और आवश्यकता दोनों का संतुलन सिखाते हैं।
पुरुषोत्तम मास का वास्तविक संदेश
आज के समय में लोग अधिकमास को केवल “काम रोकने वाला महीना” समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में यह “स्वयं को सुधारने का महीना” है। यह मास हमें बताता है कि जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और ईश्वर से जुड़ाव के लिए भी है।
भगवान श्रीकृष्ण ने इस मास को अपना स्वरूप प्रदान किया, इसलिए इसे “पुरुषोत्तम मास” कहा गया। मान्यता है कि इस महीने में किया गया जप, दान, भागवत श्रवण, गीता पाठ, गौसेवा, ब्राह्मण सेवा एवं सत्संग अक्षय फल प्रदान करता है।
इस मास में क्या करें?
- श्रीमद्भागवत एवं भगवद्गीता का पाठ
-ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप
- गौसेवा एवं अन्नदान
- जरूरतमंदों की सहायता
- तुलसी पूजन एवं दीपदान
- संयमित एवं सात्त्विक जीवन
क्या न करें?
-क्रोध, अपशब्द और तामसिक भोजन
-अनावश्यक दिखावा एवं अपव्यय
- अहंकार और दूसरों की निन्दा
- नशा एवं असंयमित व्यवहार
आधुनिक समाज के लिए संदेश
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में मानसिक तनाव, पारिवारिक दूरी और आत्मिक रिक्तता बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में पुरुषोत्तम मास हमें भीतर लौटने का अवसर देता है। यह मास केवल धार्मिक अनुष्ठान का नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के “पुरुषोत्तम” को जागृत करने का समय है।
यदि समाज इस मास के वास्तविक संदेश— संयम, सेवा, साधना और संस्कार— को समझ ले, तो पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन दोनों में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।
आचार्य पवन पाठक के अनुसार अधिकमास कोई अशुभ मास नहीं, बल्कि अधिक शुभता प्राप्त करने का अवसर” है। यह वह काल है जब मनुष्य बाहरी आडंबरों से हटकर ईश्वर, धर्म और आत्मशुद्धि की ओर अग्रसर होता है।