हल्द्वानी। वो सुन नहीं सकता, बोल नहीं सकता लेकिन जब मैदान पर उतरता है तो उसकी हर स्पाइक गूंज छोड़ जाती है। 16 साल के सुमित ने साबित कर दिया कि आवाज से नहीं, इरादों से पहचान बनती है। गुजरात में हुई नेशनल मूक-बधिर वॉलीबाल प्रतियोगिता में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व कर उन्होंने दिखाया कि जुनून किसी आवाज का मोहताज नहीं होता।
मूलरूप से बागेश्वर के बिनौला निवासी सुमित कुमार जन्म से ही सुनने और बोलने में असमर्थ हैं। दो भाइयों में बड़े सुमित की शारीरिक अक्षमता का पता चार वर्ष की आयु में लगा। होटल में मजदूरी कर उनके पिता ने डाॅक्टर को दिखाया लेकिन फायदा नहीं हुआ। इसके वह शिक्षा से वंचित रह गए। कई साल तक गांव में रहने के बाद उनका संपर्क हल्द्वानी की सेवालय संस्था से हुआ। यहां उन्होंने वॉलीबाल का प्रशिक्षण लिया। उनके हुनर और जुनून के दम पर उनका चयन राष्ट्रीय मूक बधिर वॉलीबाल प्रतियोगिता के लिए हुआ।
संस्था के सचिव रोहित जोशी ने बताया कि सुमित 11 महीनों से उनके साथ रह रहा है। खेलों के प्रति उसे काफी लगाव है। उन्होंने बताया कि सुमित को वॉलीबाल के साथ ही एथलीट की तैयारी कराई जा रही है। इससे वह नेशनल टूर्नामेंट में हिस्सा ले सकेंगे। साथ ही उन्हें हाईस्कूल की पढ़ाई कराई जाएगी।