आमतौर पर देवोत्थानी एकादशी कुमाऊं में बूढ़ी दीपावली के रूप में जाना जाता है। पिछले वर्षों तक जुआरियों के लिए यह दिन बेहद खास होता था। वह इसे अपील के दिन के रूप में मनाते थे, लेकिन इस बार नोटबंदी के चलते जुआरियों का अपील का दिन फ्लाप रहा। इक्का-दुक्का स्थानों पर ही जुए के फड़ लगे और इन फड़ों पर भी 50-100 के गिने चुने नोट ही दिखाई दिए।
बताते चलें कि दीपावली के दौरान जुआ खेलने की परंपरा बर्षों पुरानी है। जुए के फड़ दीवाली से कई दिन पहले से ही लगने शुरू हो जाते हैं। जुए का सबसे बड़ा खेल महालक्ष्मी पूजन के दिन होता है। इस दिन जो व्यक्ति हारता है वह हारी हुई रकम की भरपाई करने और जो व्यक्ति जीतता है वह और अधिक जीतने के लिए बूढ़ी दीपावली के दिन फिर से जुए के फड़ पर बैठता है।
हारे जुआरी इसे अपील के दिन के रूप में मनाते हैं। पिछले साल तक बूढ़ी दीपावली में अपील के दिन कई जगहों पर जुए के फड़ लगते थे और लाखों की हार-जीत होती थी, लेकिन इस बार बूढ़ी दीपावली के मौके पर शुक्रवार को कहीं भी जुए के बड़े फड़ नजर नहीं आए।
इक्का-दुक्का स्थानों पर जुए के फड़ लगे तो सही, लेकिन वहां भी जुए के शौकीन चाहकर भी बड़ा खेल नहीं खेल सके। जुआरियों की मानें तो 500-1000 के नोटों का चलन बंद कर देने के कारण यह स्थिति पैदा हुई।
नाम न छापने की शर्त पर जुए के शौकीन एक व्यक्ति ने बताया कि उनके जैसे कई लोगों के पास 500-1000 के नोट हैं तो सही लेकिन वह जुए के फड़ों पर चल नहीं रहे हैं। 100-50 के छोटे इतने नोट नहीं हैं उनसे बड़ा गेम खेला जा सके।
यही कारण है कि इस बार अपील का दिन यानि बूढ़ी दीपावली जुआरियों के लिए फीकी साबित हुई है। उन्होंने बताया कि इक्का दुक्का जगहों पर दस्तूर को बनाए रखने के लिए जुए के फड़ लगे तो सही लेकिन वहां भी छोटे नोटो के अभाव में बड़ा गेम नहीं हो सका।