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नी बासा घुघुती चैत की, याद ऊंछी मैत की

Thu, 07 Apr 2016 12:20 AM IST
धनसिंह बिष्ट/ हल्द्वानी
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‌‌भिटौली - फोटो : अमर उजाला
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घर में आये नये अनाज में से विवाहिता बेटी का हिस्सा दिया जाने की परंपरा से भिटौली का प्रारंभ माना गया है। चैत्र मास में माता पिता या भाई विवाहिता के ससुराल पहुंचकर उसे घर में बने व्यंजन, मिठाई, फल वस्त्र आदि भेंट कर भिटौली की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
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भिटौली का शाब्दिक अर्थ हैं भेंट करना। मान्यता है कि घर में जब नई फसल आती है तो उसमें विवाहिता बेटी का भी हिस्सा होता है। अमीर से लेकर गरीब व्यक्ति बेटी को भिटौली के रूप में उसका हिस्सा देते है। शादी के बाद की पहली भिटौली विवाहिता को बैसाख के महीने में और उसके बाद हर वर्ष चैत्र मास में दी जाती है।

पहाड़ों में रहने वाली महिलाएं मायके से आने वाली भिटौली का बेसब्री से इंतजार करती हैं। इस इंतजार को लोक गीतों के माध्यम से भी व्यक्त किया गया है। ‘नी बासा घुघुती चैत की, याद ऊंछी मैत की।’ इस वार्षिक सौगात में उपहार स्वरूप दी जाने वाली वस्तुओं के साथ कई अदृश्य शुभकामनाएं व ढेर सारा प्यार भी माता पिता व भाईयों द्वारा बेटी को दिया जाता है।
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जब मायके से भिटौली लेकर माता पिता या भाई पहुंचते है तो घर में एक त्यौहार का माहौल बन जाता है और उनके द्वारा लाई गई सामग्री को आस पड़ोस में बांटा जाता है। इस तरह यह परंपरा पारिवारिक न रहकर सामाजिक एकजुटता का छोटा सा आयोजन बन जाती है। नई पीढ़ी के लोग अब बेटियों को नगद धन या गिफ्ट देकर भिटौली की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी घर में बने पकवानों के साथ ही भिटौली दी जा रही है।
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