हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि संस्कृत भाषा की उत्तराधिकारिणी हिंदी आज वैश्विक भाषा बनने की ओर अग्रसर है। हालांकि करीब 100 वर्ष पूर्व गांधी जी ने हिंदी के वैश्विक भाषा बनने पर चर्चा की शुरूआत कर दी थी।
कुविवि के डीएसबी परिसर के हिंदी विभाग एवं महादेवी वर्मा सृजनपीठ उमागढ़ (रामगढ़) की संयुक्त पहल पर हर्मिटेज भवन सभागार में वैश्वीकरण हिंदी भाषा एवं साहित्य विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रो. दीक्षित ने कहा कि समृद्धशाली हिंदी की अनुवाद क्षमता, अन्य भाषाओं के प्रवेश के लिए खुले द्वार आदि कारणों के चलते उसका वैश्विक भाषा बनने का मार्ग खुला। हिंदी में 30 फीसदी शब्द विदेशी भाषा का होना इसका प्रमाण है। आज विश्व में सात तरह की हिंंदी बोली जाती है और 140 देशों में इसका प्रवेश हो चुका है, लेकिन दुर्भाग्य है कि हम अपनी विशेषता को नहीं पहचानते।
इससे पूर्व कुविवि कुलपति प्रो.एचएस धामी ने बतौर मुख्य अतिथि हिंदी भाषा के विकास के लिए इसे ज्ञान-विज्ञान तकनीक से जोड़ने पर जोर दिया। बीओबी के मनोज कुमार ने हिंदी को विश्व में बोली जाने वाली दूसरी बड़ी भाषा का गौरव प्राप्त होने की बात कही। प्रो. गिरीश रंजन तिवारी ने कहा कि हिंदी भाषा को और समृद्ध बनाने के लिए इसमें विदेशी भाषा के प्रचलित शब्दों का समावेश किया जाना चाहिए। महादेवी सृजनपीठ के निदेशक प्रो. डीएस पोखरिया ने आगामी वर्षों में साहित्यकारों के ज्ञान, विज्ञान और तकनीक पर कार्य करने की जरूरत बताई। इस दौरान कुलसचिव प्रो. डीसी पांडे, प्रो. मानवेंद्र पाठक, प्रो. एलएस बिष्ट बटरोही, प्रो. हर सुमन गर्ग, प्रो. एनपी सिंह, प्रो.निर्मला, प्रो.राजेश्वरी, प्रो.गंगा बिष्ट, प्रो.चंद्रकला रावत, प्रो.सीके पत, प्रो.नीता बोरा, प्रो.सावित्री कैड़ा, प्रो.श्रीष कुमार, प्रो.रजनी पंत आदि मौजूद थे। संचालन प्रो. नीरजा टंडन ने किया।
प्रदेश में अकादमी के लिए प्रस्ताव भेजे सरकार : दीक्षित
हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि उत्तराखंड में हिंदी अकादमी की स्थापना और हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रदेश सरकार की ओर से प्रस्ताव भेजा जाना चाहिए। विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके कई साहित्यकार एवं कवियों का प्रदेश से किसी न किसी रूप में संपर्क रहा है। हर्मिटेज भवन में हुई संक्षिप्त वार्ता में प्रो. दीक्षित ने कहा कि अकादमी स्थापना के लिए हिंदी भाषा की पत्रिका, संगोष्ठी, भाषा मानकीकरण, कंप्यूटरीकरण की आवश्यकता है। एक सवाल के जवाब में प्रो. दीक्षित ने कहा कि क्षेत्रीय स्तर पर बोली जाने वाली भाषा को बढ़ावा अवश्य दिया जाना चाहिए, लेकिन राजस्थानी, छत्तीसगढ़ और भोजपुरी भाषा की तर्ज पर स्वतंत्र भाषा की मान्यता की बात करना गलत है। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा के प्रसार के लिए मीडिया का रोल भी अहम है।