नैनीताल हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मामले में निर्णय सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई वाहन स्वामी स्वयं गाड़ी न चलाकर यात्री के रूप में यात्रा कर रहा हो और दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है, तो बीमा कंपनी मुआवजे की देनदारी से इनकार नहीं कर सकती।
नैनीताल हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई वाहन स्वामी स्वयं गाड़ी न चलाकर उसमें एक यात्री सवारी के रूप में यात्रा कर रहा हो और दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है, तो बीमा कंपनी मुआवजे की देनदारी से इनकार नहीं कर सकती।
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कोर्ट ने टिहरी गढ़वाल के मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मृतक के वाहन स्वामी होने के आधार पर उसके परिजनों की याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने परिजनों की अपील को स्वीकार करते हुए बीमा कंपनी को 8,34,800 रुपये का मुआवजा 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देने का निर्देश दिया है।न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार मामला 17 जनवरी 2008 का है, जब टिहरी गढ़वाल जिले के पड़ागली गांव के पास एक टाटा स्पेसियो दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। इस दुर्घटना में वाहन के मालिक लक्षमण सिंह की मौत हो गई थी।
घटना के समय वाहन को मकान सिंह नाम का व्यक्ति चला रहा था। मृतक की पत्नी पूनम देवी, तीन नाबालिग बच्चों और मां ने 11.25 लाख रुपये के मुआवजे की मांग को लेकर दावा याचिका दायर की थी। हालांकि, 18 मई 2012 को क्लेम ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि मृतक स्वयं गाड़ी का मालिक था, इसलिए उसे थर्ड पार्टी नहीं माना जा सकता और बीमा कंपनी उसकी मौत का मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं है। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि वाहन का ''''पैसेंजर कैरिंग कमर्शियल व्हीकल पैकेज'''' बीमा था, जिसके लिए बीमा कंपनी ने यात्रियों के जोखिम को कवर करने के लिए अलग से प्रीमियम लिया था।
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कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना के वक्त मृतक गाड़ी नहीं चला रहा था, बल्कि एक यात्री के रूप में उसमें मौजूद था, इसलिए केवल मालिक होने के आधार पर उसके अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों और आईआरडीए के दिशा निर्देशों का हवाला देते हुए अदालत ने मृतक की उम्र और 5 आश्रितों को ध्यान में रखते हुए मुआवजे की राशि तय की और न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी को यह राशि आठ सप्ताह के भीतर जमा करने का आदेश दिया।