नैनीताल। डिजिटल क्रांति के इस दौर में पहाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को सहेजने के लिए कुमाऊं विश्वविद्यालय ने एक ऐतिहासिक और वैज्ञानिक शुरुआत की है। इसके तहत विलुप्त होते कुमाउंनी शब्दों को हमेशा के लिए डिजिटल आर्काइव में सुरक्षित किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय के हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग (डीएसबी परिसर) और आईक्यूएसी के संयुक्त सहयोग से आयोजित कार्यशाला के तहत अब तक 1000 से अधिक महत्वपूर्ण कुमाउंनी शब्दों की शुद्ध ऑडियो रिकॉर्डिंग का कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। कार्यशाला की संयोजक प्रो. चंद्रकला रावत ने बताया कि इन रिकॉर्ड किए गए सभी शब्दों को अंतरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आईपीए) के मानकों के अनुरूप लिप्यंतरित भी कर दिया गया है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह है कि देश-दुनिया की आने वाली पीढ़ियां पहाड़ की इस अनमोल भाषाई विरासत का बिल्कुल शुद्ध, सटीक और प्रामाणिक उच्चारण सीख सकें।
लोक पर्व हरेला पर डिकारे की कार्यशाला होगी
नैनीताल। कुमाऊं में लोक पर्व हरेला पर बनाए जाने वाले डिकारे का विशेष महत्व है। हरियाली के प्रतीक पर्व के पूर्व डिकारों की पूजा की जाती है। स्थानीय निवासी और लोक परंपरा के जानकार बृजमोहन जोशी बताते हैं कि जीवन वर्षा कला संगम समिति मेहरागांव की ओर से इसके लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। ऑनलाइन प्रतियोगिता में प्रतिभागी को डेढ़ मिनट का वीडियो बनाना होगा। इसमें बताना होगा कि परंपरा किस तरह विलुप्त हो रही है। प्रतिभागी चार जुलाई तक आवेदन कर सकते हैं। पांच जुलाई को एक बजे से पद्मश्री यशोधर मठपाल एवं बृजमोहन जोशी की ओर से डिकारे का निर्माण एवं महत्व की जानकारी दी जाएगी। कार्यक्रम ब्लॉक रिसोर्स सेंटर महरागांव भीमताल में होगा।