मेडिकल कालेज की वन भूमि(12 हेक्टेयर पुराने और 4 हेक्टेयर के नये प्रस्ताव) पर पेच लग गया है। 2010 में उत्तराखंड फारेस्ट हास्पिटल ट्रस्ट को भंग कर चिकित्सा शिक्षा विभाग को मेडिकल कालेज की कमान सौंपी गई थी। अब केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वन भूमि हस्तांतरित करने से पहले जो जमीन देने संबंधी प्रक्रिया की गई है, उसका ब्यौरा तलब किया है।
2004-05 में उत्तराखंड फारेस्ट हास्पिटल ट्रस्ट के अधीन मेडिकल कालेज को शुरू किया गया। इसमें तराई केंद्रीय वन प्रभाग की करीब 12 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि(जिसमें सुशीला तिवारी अस्पताल और कैंसर इंस्टीट्यूट आदि है) थी। वन भूमि का मामला नहीं फंसे इस लिए उसे वन विभाग में ही एक तरह से अधीन करने के साथ वनाधिकारियों को ट्रस्ट सचिव, उप सचिव पद पर डेपुटेशन पर तैनात किया गया।
सामान्य तौर पर वन भूमि किसी दूसरे सरकारी विभाग को दी जाती है, तो भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया डीएफओ, वन संरक्षक, सीसीएफ कुमाऊं, देहरादून से होते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तक पहुंचती है। क्षतिपूरक वनीकरण, नेट प्रेजेंट वैल्यू आदि जमा करने के बाद बड़ी मुश्किल से जमीन मिल पाती है। पर 2010 में वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी करे बगैर ही शासन ने ट्रस्ट को भंग करने के साथ ही मेडिकल कालेज को जैसा है, वैसा है की स्थिति में चिकित्सा शिक्षा विभाग को सौंप दिया गया।
अब मेडिकल कालेज 250 का बेड का नया अस्पताल बनना चाहता है, वह हीरानगर के सामने और कैंसर इंस्टीट्यूट से सटी वन भूमि चाहता है, जिसके लिए चार हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि की जरूरत है। मेडिकल कालेज ने नई चार हेक्टेयर और करीब 12 हेक्टेयर पुरानी वन भूमि (कुल एक साथ करीब 16 हेक्टेयर की) हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू की गई। अब फाइल पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय पहुंची है। इसके बाद मंत्रालय हरकत में आया है। मंत्रालय के उप वन संरक्षक एमएस नेगी ने वन महकमे के अपर प्रमुख वन संरक्षक एव नोडल अफसर को पत्र भेजा है, उसमें कहा गया है कि करीब 12 हेक्टेयर वन भूमि पर पहले ही कार्य हो चुके हैं, यह भूमि तो मेडिकल कालेज के ही अधीन है, करीब ‘सवा चार हेक्टेयर नई भूमि’ का मामला है। मंत्रालय ने पत्र में कहा है कि आगे की कार्रवाई तो तभी होगी, जब करीब 12 हेक्टेयर वन भूमि का मामला है, उसके प्रत्यावर्तन से संबंधित सक्षम अधिकारी स्वीकृतियों के संबंध में जानकारी भेजे। सूत्रों के अनुसार यही जानकारी भेजने को लेकर ही वनाधिकारियों की सांस अटकी हुई है, इसमें एक तरह से अवैध हस्तांतरण का खुलासा हो जाएगा। इसमें वनाधिकारियों की भी गर्दन फंस सकती है। ऐसे में यह पत्र इन दिनों वन विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है।