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हिमालय की गोद में रहकर रचनाएं गढ़ सकेंगे साहित्यकार

Sat, 26 Mar 2016 12:51 AM IST
अमरनाथ/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
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महादेवी वर्मा - फोटो : अमर उजाला
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हल्द्वानी। अब कलमकार, कूचीकार और रंगकर्मी हिमालय की गोद में रहकर अपनी रचनाएं गढ़ सकेंगे। रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ ऐसे सृजन साधकों को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करेगी। ‘मीरा कुटीर’ नाम से मशहूर इस पीठ का स्वरूप अब व्यापक बनाने की तैयारी है। यह केंद्र केवल कवयित्री महादेवी वर्मा के साहित्य के लिए ही नहीं जाना जाएगा, बल्कि यह संपूर्ण हिंदी साहित्य के स्मृति स्थल एवं रचना प्रेरणा केंद्र के रूप में पहचान बनाएगा।
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आने वाले दिनों में हिमालय प्रेमी रचनाकार एवं संस्कृतिकर्मी यहां ठहर कर एकांत माहौल में रचनात्मक ऊर्जा पाएंगेे। महादेवी वर्मा सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने बताया कि पीठ में साहित्यकारों के लिए अभी तक ठहरने की व्यवस्था नहीं है। इसलिए कोशिश है कि साहित्य सृजन शिल्पियों को उनकी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए यहां ठहराने के साथ एकांत का वातावरण दिया जाए।

साथ ही देश में विभिन्न क्षेत्रों में अनुभवी संस्कृतिकर्मियों और शोधार्थियों के बीच संवाद के लिए भी व्यवस्था बनाई जा रही है। रावत ने बताया कि इस पीठ का दायरा केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहेगा। चूंकि महादेवी वर्मा खुद साहित्य के अलावा चित्रकारी में रुचि रखती थीं, इसलिए कला और संस्कृति की धारा को भी गतिशील बनाने की कोशिश की जा रही है।
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बता दें कि 26 मार्च, 1907 को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में जन्मी महादेवी का कार्यक्षेत्र इलाहाबाद रहा, लेकिन उन्होंने अपनी कर्मस्थली नैनीताल से 25 किमी दूर रामगढ़ को बनाया। 1933 में कोलकाता स्थित शांति निकेतन में भेंट के दौरान गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने महादेवी को पहली बार रामगढ़ के प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में बताया और यहां बसने की सलाह दी। 1934 में बदरीनाथ की यात्रा से वापसी में रात्रि विश्राम के लिए वह रामगढ़ के उमागढ़ गांव में रुकीं।

यहां का शांत और रमणीक वातावरण महादेवी को साहित्य सृजन के लिए उपयुक्त लगा। उन्होंने 1936 में अपने ग्रीष्मकालीन प्रवास के लिए यहीं पर भवन बनाया, जिसका नाम उन्होंने अपनी आराध्य के नाम पर मीरा कुटीर रखा। उन्होंने कई गद्य रचनाओं के अलावा अपने कविता संग्रह दीपशिखा (1942) की समस्त कविताएं इसी भवन में रहकर लिखीं।
1987 में महादेवी वर्मा की मृत्यु तक यह भवन में साहित्य और दर्शन संबंधी कई गंभीर चर्चाओं का गवाह रहा।

इलाचंद्र जोशी, सुमित्रानंदन पंत, डा. धर्मवीर भारती समेत कई नामचीन साहित्यकारों ने इस भवन में रचनाएं लिखीं। बाद में यह उपेक्षित हो गया। 2005 में उत्तराखंड सरकार ने महादेवी साहित्य संग्रहालय की परिसंपत्तियों को कुमाऊं विश्वविद्यालय को हस्तांतरित कर दिया और महादेवी वर्मा के नाम से यहां सृजन पीठ की स्थापना की। अब इस पीठ के स्वरूप को व्यापक करने की योजना है। 

इस बार महादेवी की जयंती के मौके पर 30 मार्च को गोष्ठी रखी गई है, जिसमें मंगलेश डबराल समेत कई जाने-माने साहित्यकार शामिल होंगे। गोष्ठी में तमाम शोधार्थियों को बुलाया गया है।

महादेवी वर्मा सृजन पीठ  के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया बताते हैं कि महादेवी वर्मा सृजन पीठ में रचनाधर्मियों और संस्कृतिकर्मियों को ठहरने के लिए दो कमरे इस वित्तीय वर्ष में तैयार हो जाएंगे। इसके अलावा 10 कमरे बनाने के लिए उद्यान विभाग से लीज पर जमीन लेने के लिए उत्तराखंड सरकार को प्रस्ताव भेजा जा रहा है, ताकि देश-विदेश की साहित्यिक और रचनाशील सांस्कृतिक प्रतिभाएं यहां आकर अध्ययन, लेखन और शोध कार्य कर सकें। 
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