सुल्ताना डाकू को गुजरे सदियां बीत गई हैं, लेकिन उसके किस्से इतने अर्से बाद आज भी ‘जिंदा’ हैं। शीशमहल के पास सुल्तान नगरी का नाम उसके ठहरने के कारण पड़ने की बात हो या फिर गड़प्पू के पास उसका ‘कुआं’। उससे जुड़ी कहानियां लोगों की जुबां पर आ ही जाती है। अब फिर सुल्ताना डाकू और उसकी गिरफ्तारी से जुड़ी एक बात और सामने आई है। सिजवाली टावर निवासी विजय सिजवाली का कहना है कि उनके दादा सरदार तुला सिंह सिजवाली ने अपने एक दोस्त का बदला लेने के लिए सुल्ताना डाकू के पीछे पड़ गए थे। उनके कारण ही अंग्रेजों की नाक में दम करने वाला सुल्ताना हत्थे चढ़ा।
विजय सिजवाली कहते हैं कि सुल्ताना डाकू का आतंक तत्कालीन यूनाईटेड प्रोविंश के बिजनौर, कालाढूंगी से लेकर कई हिस्सों में था। अंग्रेज उसे पकड़ने की कोशिश में लगे थे। इस दौरान सुल्ताना डाकू ने हल्द्वानी के जमींदार रहे खड़क सिंह कुमड़िया के लामाचौड़ घर में धावा बोला। यहां लूटपाट करने के साथ ही परिवार वालों के साथ मारपीट की।
उनके अनुसार इसमें खड़क सिंह और परिवार एक और सदस्य की मौत हो गई। खड़क सिंह उनके दादा तुला सिंह सिजवाली के घनिष्ठ मित्रों में एक थे, इस घटना के बाद वह अपने दोस्त का बदला लेने के लिए सुल्ताना डाकू के पीछे लग गए। उस दौरान तेज तर्रार अफसर एसपी बिजनौर फ्रैडी यंग भी सुल्ताना डाकू की सरगर्मी से तलाश कर रहे थे।
विजय सिजवाली का दावा है कि दादा तुला सिंह के सहयोग से सुल्ताना डाकू को 1925 में गड़प्पू के पास पकड़ा गया। उस वक्त एक दुर्लभ फोटोग्राफ भी उनके पास है, जिसमें पुलिस कर्मियों के साथ सुल्ताना डाकू दिखाई दे रहा है। वह कहते हैं कि घटना के बाद अंग्रेजों ने खुश होकर उन्हें इनाम स्वरूप बब्ले स्कॉट बंदूक भी भेंट की थी, जो आज भी हमारे लिए एक धरोहर के तौर पर हैं। बाद में यंग अवध प्रांत के आईजी भी बने।
वह कहते हैं कि दानदाता के तौर पर क्षेत्र में लोकप्रिय रहे दादा को सरदार की पदवी मिली, वह प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट के साथ भी जुड़े रहे। उनके साथ एक फोटो भी हैं। इसमें जिम कार्बेट, पुलिस अफसर यंग और दादा साथ-साथ है।