बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के भले ही दावे किए जा रहे हों, मगर सरकारी अस्पतालों की स्थिति सबसे अधिक बदहाल है। कुमाऊं में लीवर के मरीजों के ‘कीपर’ यानी रखवाले विशेषज्ञ डाक्टर सरकारी अस्पताल में नहीं हैं। लीवर की बीमारी होने पर भी मरीजों को विशेषज्ञ डाक्टर न होने के कारण देहरादून, दिल्ली या यूपी के अस्पतालों का रुख करना पड़ेगा।
मनुष्य के शरीर में लीवर की भूमिका अहम है। पाचन का काम लीवर के माध्यम से ही होता है। कुमाऊं के सरकारी अस्पतालों में अभी तक कोई भी हिपैटो गैस्ट्रो इंट्रोलॉजिस्ट नहीं है। हल्द्वानी में एक निजी डाक्टर गैस्ट्रोइंट्रोलाजिस्ट से संबंधित मरीज देखते हैं और एंडोस्कोपी भी करते हैं। सुशीला तिवारी और बेस अस्पताल में भी हिपैटो गैस्ट्रो इंट्रोलाजिस्ट नहीं है। बेस अस्पताल में प्रतिदिन लगभग 12 सौ से 14 सौ मरीज आते हैं। जबकि पहाड़ से भी सबसे अधिक मरीज सुशीला तिवारी अस्पताल में आते हैं।
एसटीएच में भी प्रतिदिन की ओपीडी लगभग एक हजार मरीजों की होती है। एसटीएच के एमएस डा. एके पांडे ने बताया कि एंडोस्कोपी की सुविधा तो हैं मगर लीवर से संबंधित विशेषज्ञ नहीं है। बेस अस्पताल के सीएमएस डा. एससी पंत ने बताया कि उक्त सुविधा भी नहीं है और कोई विशेषज्ञ भी नहीं है। ऐसे में लीवर संबंधी मरीजों को देहरादून के एक निजी अस्पताल का सहारा है या फिर पड़ोसी राज्य में जाना पड़ेगा। राज्य बनने के 15 वर्षों बाद भी हमारे राजनेताओं ने इस ओर कोई गंभीर प्रयास नहीं किए। हां, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने का दावा जरूर करते रहे। स्थिति ये है कि सरकारी अस्पताल डाक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं।
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ये हैं लीवर खराब होने के कारण
= अत्यधिक मदिरा का सेवन करना।
= हेपेटाइटिस बी एवं सी (काला पीलिया) होना।
= सामान्य पीलिया का बिगड़ना।
= दवाइयों का अत्यधिक सेवन।
= खाद्य पदार्थों में प्रयोग होने वाले केमिकल्स।
= मोटापा अधिक होने के कारण लीवर में वसा का जमना।
= अन्य नशे चरस, गांजा, अफीम, ड्रग्स का सेवन करने पर।
= कैंसर होने पर।
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ये हैं लीवर स्वस्थ रखने के उपाय
= शराब का सेवन न करें।
= हेपेटाइटिस बी एवं सी (काला पीलिया) का इलाज कराएं।
= जंक फूड एवं अत्यधिक तले-भुने खाना न खाना।
= दवाओं का सेवन अपने आप न करें।
= प्रतिदिन 45 से 60 मिनट का व्यायाम करें।