मार्च-अप्रैल में हुई बेमौसमी बारिश, ओलावृष्टि एवं अंधड़ से जहां फल-सब्जी और अन्य फसलें बुरी तरह बर्बाद हुई हैं, वहीं इसका सीधा असर जिले में शहद उत्पादन पर भी पड़ा है। ऐसे में शहद के शौकीनों को इस बार शीशम, लीची आदि के शहद से वंचित रहना पड़ सकता है। बेमौसमी बारिश से जिले में एक हजार से अधिक व्यावसायिक शहद उत्पादक प्रभावित हुए हैं।
नैनीताल जिले में ज्योलीकोट, हल्द्वानी, गौलापार, रामनगर और बैलपड़ाव शहद उत्पादक क्षेत्र के रूप में जाने जाते हैं। उद्यान विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में जिले में एक हजार से अधिक व्यावसायिक शहद उत्पादक हैं, जिनके पास 50 से लेकर 100 या फिर उससे अधिक मधुमक्खियों की कालोनियां हैं। उक्त क्षेत्रों में व्यावसायिक शहद उत्पादक यूरोपियन मौन मैलीफेरा नामक मधुमक्खियों का पालन करते हैं। इसके अलावा कई लोग घरों की दीवारों में छेद बनाकर एवं घरों और इसके आसपास भी छोटे स्तर पर मधुमक्खी पालन करते हैं।
मौन विशेषज्ञों के मुताबिक तराई-भाबर क्षेत्र में मौजूद मैलीफेरा नामक मधुमक्खी मार्च/अप्रैल में मुख्य रूप से शीशम, लीची, कढ़ीपत्ता, नीम आदि से शहद तैयार करती है, लेकिन इस बार मार्च-अप्रैल में हुई बेमौसमी बारिश, ओलावृष्टि और अंधड़ से शीशम, लीची, कढ़ीपत्ता, नीम आदि के फूलों को खासा नुकसान हुआ, जिसका असर शहद उत्पादन पर पड़ा। जिले में अकेले मैलीफेरा मौनवंशों से 1092 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन होता है। वरिष्ठ मौन विशेषज्ञ और जिला उद्यान अधिकारी डा.रामेश्वर सिंह बताते हैं कि शीशम और लीची के शहद की खासी मांग रहती है, लेकिन इस बार यह शहद शायद ही मिल सके।
मधुमक्खियों के कृत्रिम भोजन के लिए की 50 लाख की मांग
जिला उद्यान अधिकारी डा.रामेश्वर सिंह बताते हैं कि अप्रैल से सितंबर तक मधुमक्खी शहद का उत्पादन नहीं करती है, जिसके चलते उन्हें जिंदा रखने के लिए कृत्रिम भोजन के रूप में चीनी का घोल दिया जाता है। डा. सिंह बताते हैं कि बेमौसमी बारिश के कारण शहद उत्पादकों को हुए नुकसान को देखते हुए उन्हें कृत्रिम भोजन के लिए राशि उपलब्ध कराने की मांग की गई है। इसके लिए विभागीय सचिव को प्रस्ताव भेजकर 50 लाख रुपए की मांग की गई है।