भाषाविद् जयंती प्रसाद नौटियाल के शोध को आधार माने तो हिंदी देश ही नहीं, बल्कि विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।
देश में इसके उत्थान के लिए समय-समय पर प्रयास होते रहे हैं, लेकिन वर्तमान समय में यदि हिंदी की जमीन तलाशें तो अब तक हुई घोषणाएं लड़खड़ाती ही नजर आ रही हैं। कुल मिलाकर हमारी हिंदी जगह मांग रही है, इसके लिए जरूरी कदम समय रहते उठाए जाने चाहिए।
वर्ष 2014 में केंद्र में नई सरकार बनने के बाद सरकारी कामकाज में भी हिंदी को बढ़ावा दिए जाने की बात कही गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हिंदी में शपथ लेना हिंदी भाषियों के लिए सुखद अनुभव था।
उसी दरमियाना घोषणा की गई थी कि सभी मंत्रालयों की वेबसाइटों के हिंदी संस्करण का लिंक भी मेन पेज में रहेगा। कहा जा रहा था कि सरकारी विभागों और मंत्रालयों के सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी हिंदी को बढ़ावा दिया जाएगा।
लेकिन इस दिशा में अभी तक केंद्र के प्रयास आंशिक ही हैं। पीएमओ की वेबसाइट पर भी हिंदी संस्करण का असर कम ही दिख रहा है। यदि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वेबसाइट को छोड़ दें तो बाकी अन्य में भी इसका असर आंशिक ही है।
www.mygov.in/hi/ में प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर तो हिंदी में हैं, लेकिन उनका कोट अंग्रेजी में ही है। इसी प्रकार पीएमओ की वेबसाइट के हिंदी संस्करण में न्यूज फीड सेक्शन में करीब हफ्ते भर की खबरें अंग्रेजी में हैं।
अलबत्ता हिंदी अनुवाद जल्द उपलब्ध कराने की बात लिखी गई है। ऐसे ही लगभग सभी मंत्रालयों के ट्विटर अकाउंट और फेसबुक आदि में बने अधिकारिक पेजों आदि पर भी कोई भी पोस्ट हिंदी के बजाए अंग्रेजी पर ही मिलता है।
एक साल बाद भी नहीं हो सका अनुवाद
बीते साल भोपाल में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकार ने घोषणा की थी कि जल्द से जल्द तकनीकी शिक्षा की पाठ्यक्रम सामग्री हिंदी में तैयार कर ली जाएगी। लेकिन, एक साल बीतने के बाद भी विश्वविद्यालयों में तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रमों को भी हिंदी में उपलब्ध नहीं कराया जा सका है।
इससे करोड़ों रुपये खर्च कर होने वाले सरकारी आयोजनों पर भी सवालिया निशान लगने लगे हैं।