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कुमाऊं में एमडीआर-एक्सडीआर मरीजों की संख्या हुई कम

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हल्द्वानी। कुमाऊं में एक्सटेंसिवली ड्रग रेजिस्टेंस (टीबी जिसमें सामान्य टीबी और एमडीआर की दवा काम नहीं करती है) के मरीजों की संख्या कम हुई है। कुछ चिंता नैनीताल जिले को लेकर है, यहां पर मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआर) मरीजों की संख्या बढ़ी है। डॉक्टरों के अनुसार कोविड के समय हर चीज प्रभावित हुई थी, जिसमें रोगी की गतिविधियां आदि भी प्रभावित हुई हैं।
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पूरे देश में डिटेक्शन रेट कम हुए हैं, ऐसे में काफी संभावना है कि इसके चलते रोगियों की संख्या कम हुई होगी। टीबी की बीमारी का पता चलने के बाद इलाज शुरू किया जाता है, कई बार रोगी पर टीबी की सामान्य तौर पर दी जाने वाली दवाएं काम नहीं करती है। इसकी जांच कराई तो पता चलता है कि रोगी में सामान्य टीबी के लिए दी जाने वाली दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता है, जिसे एमडीआर कहते हैं।
इसके बाद सेकेंड लाइन दवाओं को शुरू किया जाता है। कई बार रोगी को एमडीआर के तहत दी जाने वाली दवाइयां तक कारगर नहीं होती है, जिसे एक्सडीआर कहते हैं। फिर इसके आधार पर आगे की दवाइयां शुरू की जाती हैं।
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कुमाऊं में मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी के टीबी एंड चेस्ट रोग विभाग में एमडीआर और एक्सडीआर रोगियों की जांच से लेकर इलाज की सुविधा है। यहां के दो साल के आंकड़े बताते हैं कि कुमाऊं में एमडीआर और एक्सडीआर रोगियों की संख्या कम हुई है। वर्ष-2020 में एमडीआर रोगियों की संख्या 140 थीं, जो वर्ष-2021 में घटकर 138 रह र्गइं। एक्सडीआर रोगियों की संख्या वर्ष-2020 में 34 थीं, जो वर्ष-2021 में कम होकर 14 रह गईं। हालांकि नैनीताल जिले की बात करें तो यहां की स्थिति थोड़ी चिंता वाली है। वर्ष 2021 में एमडीआर रोगियों की संख्या 48 थीं, जो अगले साल बढ़कर 52 हो र्गइं।
मेडिकल कॉलेज में जांच और इलाज की सुविधा
हल्द्वानी। मेडिकल कॉलेज के टीबी एंड चेस्ट रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आरजी नौटियाल कहते हैं कि कुमाऊं में जांच और इलाज की सुविधा मेडिकल कॉलेज के टीबी एंड चेस्ट रोग विभाग के तहत है। टीबी की पुष्टि के बाद रोगी के दो सैंपल एमडीआर और एक्सडीआर जांच के लिए भेजे जाते हैं। अगर सामान्य टीबी के अलावा अन्य टीबी हो तो जल्द इलाज शुरू किया जा सके। एमडीआर की जांच मेडिकल कालेज में ही हो जाती है, जबकि एक्सडीआर जांच के लिए सैंपल देहरादून को भेजा जाता है।
मरीजों के लिए निशुल्क दवाइयां उपलब्ध
हल्द्वानी। रोगियों को दवा से लेकर पोषण के लिए धनराशि भी मिलती है। एमडीआर का इलाज रोग की गंभीरता के हिसाब से नौ महीने से डेढ़ साल और एक्सडीआर रोगियों का इलाज बीस महीने चलता है। एमडीआर और एक्सडीआर रोगियों की भर्ती के लिए विभाग में अलग-अलग व्यवस्था है।
इन कारणों से होता एमडीआर और एक्सडीआर
कई बार रोगी टीबी की दवाओं को छोड़ देते हैं, जिससे एमडीआर होने का खतरा रहता है। इसके अलावा डायबिटीज, एल्कोहल का सेवन करने से लेकर कुछ लोगों में टीबी के प्रति अनुवांशिक रूप से टीबी को लेकर प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, उन्हें यह दिक्कत होने का ज्यादा खतरा रहता है। कोविड का प्रभाव हर चीज पर पड़ा है। ऐसे में जांच कम हुई है, पूरे देश में डिटेक्शन कम हुए हैं। ऐसे में जो कमी दिखाई दे रही है, उसका एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है।
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- डॉ. आरजी नौटियाल, विभागाध्यक्ष, टीबी एंड चेस्ट रोग, मेडिकल कॉलेज
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