फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Haldwani: देखते ही देखते बनभूलपुरा में मलिक ने बगीचे में बसा दिए परिवार, जानें कैसे शुरू हुआ अतिक्रमण का खेल

Mon, 12 Feb 2024 06:42 AM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल

सार

Violence in Haldwani: हल्द्वानी के बनभूलपुरा में मलिक का बगीचा कभी एक क्रिकेट मैदान के बराबर बड़ा था। लेकिन देखते ही देखते बनभूलपुरा में आबादी और मकान दोनों इस कदर बड़े कि यहां की संकरी गलियां वाहनों की भीड़ से और तंग हो गई।
विज्ञापन
Haldwani Violence - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

 

बनभूलपुरा में स्थित मलिक का बगीचा कभी एक क्रिकेट मैदान के बराबर बड़ा था। जहां हरे भरे पेड़ हुआ करते थे। बगीचे के अंदर दो-तीन परिवार रहते थे, जो इसकी देखभाल करते थे। जबकि इसके चारों ओर 80-100 परिवार हुआ करते थे। 80 के दशक में इक्के दुक्के पक्के मकान बनने की शुरुआत हुई जो धीरे-धीरे हजारों में पहुंच गई। उत्तराखंड बनने के बाद बनभूलपुरा में आबादी और मकान दोनों इस कदर बड़े कि यहां की संकरी गलियां वाहनों की भीड़ से और तंग हो गई।

 

हल्द्वानी में अपना बचपन और जवानी दोनों गुजार चुके जगमोहन सिंह बताते हैं कि वह अकसर बनभूलपुरा की ओर आया करते थे। उनके बड़े बताते थे कि यहां एक बहुत बड़ा बगीचा है, जहां आम, लीची के पेड़ थे। जब उन्होंने होश संभाला तब से बनभूलपुरा में लाइन नंबर एक से लाइन नंबर 17 तक बसी हुई देखी। जिसमें लाइन नंबर एक, आठ और 17 की सड़कें आज की तरह ही चौड़ी थी, लेकिन शेष गलियां काफी तंग और संकरी थी। 1980 के बाद यहां रामपुर, स्वार, टांडा आदि जगहों से आकर लोग बसने शुरु हुए थे। तब यहां सड़कें कच्ची थी और अधिकतर लोग झोपड़ी में रहा करते थे।

विज्ञापन



ये पढ़ें- Haldwani Riots : नौकरी की तलाश में बिहार से हल्द्वानी पहुंचा था युवक, सिर में तीन गोली लगने से मौत; जांच शुरू

विज्ञापन

1990 के समय तक बनभूलपुरा में 12 से 15 हजार की आबादी होगी। जबकि जिस जगह पर हिंसा हुई है, उसके आसपास 3 से साढ़े 3 हजार लोग रहते होंगे। लाइन नंबर 17 में स्थित बालिका इंटर कालेज तक ही आबादी हुआ करती थी। मगर इसके बाद यहां आबादी बढ़नी शुरु हुई। मलिक का बगीचा करीब 35 से 40 बीघा में हुआ करता था। इसके अंदर दो चार ही परिवार रहा करते थे। लेकिन इसके चारों ओर 80-100 परिवार हुआ करते थे। शायद तब से बगीचा बिकने की शुरुआत हो चुकी थी। 2000 के बाद मलिक का बगीचे में जमीन बिकनी शुरू हुई और देखते ही देखते यहां पक्के मकान भी बनने लगे। यह जमीन स्टांप पेपर में बिकी है, जिसको उत्तर प्रदेश के रामपुर, मुरादाबाद और इससे लगी उत्तराखंड की सीमा आदि क्षेत्रों में लोगों ने खरीदा है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें