हल्द्वानी में हर साल अस्थमा के तकरीबन डेढ़ हजार मरीज बढ़ रहे हैं। अनुवांशिक माने जाने वाला यह रोग एलर्जी के कारण तेजी से बढ़ता है। इनसर्च (इंडियन स्टडी आन इंपीडेमोलाजी आफ अस्थमा रिस्पायरेटरी सिम्टमस एंड क्रानिक) के पांच साल के सर्वे पर भरोसा करें तो देश की सवा अरब की आबादी में लगभग दो करोड़ दस लाख लोग अस्थमा से ग्रसित सामने आए हैं। टीबी एवं श्वास रोग विभाग के एचओडी डा. आरजी नौटियाल के मुताबिक सर्वे सन् 2005 से लेकर 2009 तक देश के विभिन्न हिस्सों में किया गया।
रोग में सिकुड़ जाती हैं सांस की नलियां
माता-पिता में अस्थमा होने के कारण ही बच्चों में यह बीमारी फैलती है। इसकी चपेट में आने से सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और मरीज को मुंह से या नाक फुलाकर सांस लेनी पड़ती है। अस्थमा के रोगी को किसी भी वस्तु से एलर्जी (खानपान, वातावरण, बिस्तर) हो सकती है। खांसी बढ़ने के साथ ही दौरे पड़ने लगते हैं, जिसे अस्थमेटिक अटैक कहा जाता है।
फूलों का सीजन, पालतू जानवर मुसीबत
जनवरी से मार्च और अगस्त से अक्टूबर माह में जब फूलों का सीजन आता है तो परागकण के कारण भी मरीजों की परेशानी बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि अस्थमा के मरीजों को घर में पालतू जानवर नहीं पालने चाहिए। पालतू जानवरों के मलमूत्र और बालों से मरीजों को परेशानी होती है। आटा, मैदा या खड़िया फैक्ट्री में काम करने वाले लोगों में अस्थमा होने की संभावना अधिक होती है।
ये हैं अस्थमा के लक्षण
= बार-बार सर्दी जुकाम होना।
= जुकाम का लगातार बहना।
= नाक फुलाकर या मुंह खोलकर सांस लेना।
= लगातार खांसी का बने रहना।
= बच्चों में पसली चलना।
ये हैं बचाव के उपाय
= एलर्जी वाले भोजन का त्याग करें।
= नमी से दूर रहें।
= कारपेट का इस्तेमाल घर में अधिक न करें।
= कारपेट की वैक्यूम क्लीनर से निरंतर सफाई करें।
= बिस्तरों को धूप दिखाएं और प्रति सप्ताह चादर और तकिया के कवर बदलें।
= गाड़ी, फैक्ट्री या चूल्हे के धुएं से दूर रहें।
= पालतू जानवरों के पास जाने से बचें।