भले ही वर्तमान में शासन और प्रशासन लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लाख दावे करे, लेकिन शहरी क्षेत्रों के साथ ही दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में भी ढोल और बैंड की गूंज के बीच लोक संस्कृति धुन अपना अस्तित्व खोती जा रही है।
निजी स्तर पर तैयार किए गए सांस्कृतिक दलों के सदस्य किसी तरह से संस्कृति के संरक्षण के लिए जूझ रहे हैं। श्री सिद्धदेव जगदंबा छोलिया नृत्य दल गलनी ओखलकांडा के मुखिया नारायण राम आर्य बताते है कि उनके दल में 12 लोग हैं।
मशकबीन वह खुद बजाते हैं। उन्होंने बताया कि अब तक वह पिथौैरागढ़ छलिया महोत्सव, दिल्ली, देहरादून, हरियाणा आदि शहरों में कई कार्यक्रम कर चुके हैं। बीते कई वर्षों से वह नैनीताल के मां नंदा देवी महोत्सव में आ रहे हैं।
बोले वर्तमान में ढोल, बैंड व कैसियो के बढ़ते प्रचलन से अब छोलिया दलों की डिमांड नहीं के बराबर रह गई है। निजी स्तर पर वह लोक संरक्षण की पहल कर रहे हैं।
दूसरी ओर पिथौरागढ़ जिले के बेड़ीनाग ब्लॉक के धर्मशिला छोलिया दल दसौली (पांखू) के मुखिया भरत राम दास ने बताया कि उनकी टीम में 18 सदस्य हैं। नैनीताल के अलावा वह उत्तराखंड के कई मेलों में अपने निजी स्तर से लोक संस्कृति का प्रचार प्रसार कर रहे हैं।
छोलिया दल दन्या के मुखिया दान सिंह बोरा का कहना है बदलते दौर में अब धीरे-धीरे छोलिया दलों के प्रति लोगों का रुझान कम होते जा रहा है, जो चिंता का विषय है।
नैनीताल नंदा देवी महोत्सव में प्रतिभाग करने आए इन सभी दलों की एक ही पीड़ा है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद सत्ता में आई भाजपा और कांग्रेस सरकारों ने विभिन्न मंचों से छोलिया दलों को प्रोत्साहन देने की घोषणा जरूर की है, लेकिन धरातल पर उन्हें कोई सुविधा नहीं मिल सकी है।
उनकी मांग है कि सरकार अगर उन्हें सहायता दे तो उससे ड्रेस, वाद्य यंत्र समेत अन्य उपकरण खरीद सकते हैं।