देर से ही सही पर अब जंगली जानवरों और इंसानों के टकराव के बढ़ते मामलों की तह में जाने की कोशिश की जा रही है। वन अनुसंधान केंद्र ने पहल करते हुए वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं, वजह, रोकने को किए उपाय आदि के विगत पांच सालों के आंकड़े जुटा रहा हैं।
ये आंकड़े कुमाऊं और गढ़वाल के नेशनल पार्क, 35 वन डिवीजन से लिए जा रहे हैं। इस शोध में प्रभागीय वनाधिकारियों से टकराव को रोकने के लिए सुझाव भी मांगे गए हैं ताकि ठोस रणनीति तैयार की जा सके।
सूबे के करीब 71 प्रतिशत भू भाग पर जंगल है। जाहिर है कि जंगली जानवर भी ज्यादा होंगे। पिछले कुछ सालों में जंगली जानवरों की आबादी में दखल बढ़ी है। वहीं पर्वतीय जिलों में जंगली जानवरों ने फसलों को भी सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।
इसकी वजह से दुर्गम और सीमांत में बसे गांव के गांव खाली हो रहे हैं। प्रदेश की ज्वलंत समस्या पलायन और मानव वन्य जीव संघर्ष को रोकने के लिए वन अनुसंधान केंद्र शोध करने जा रहा है। शोध के बाद इन समस्याओं से निजात दिलाने के लिए ठोस और कारगर रणनीति बनाई जाएगी।
फिलहाल पहले चरण में मानव वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं का तीन प्रपत्रों में ब्योरा जुटाया जा रहा है। पहले प्रपत्र में पिछले पांच सालों में हुई घटनाओं का समूचा विवरण, तिथि, वन्य अभ्यारण्यों से दूरी, वन्य जीव का विवरण, फसल, मानव, पालतू पशु क्षति, मानवों से वन्य जीवों को क्षति, मुआवजे का विवरण मांगा गया है।
दूसरे प्रपत्र में मानव वन्य जीव संघर्ष रोकने को किए गए कार्यों और परिणाम और तीसरे प्रपत्र में वन्य अधिकारियों से संघर्ष की रोकथाम के लिए सुझाव मांगे गए हैं। 35 डिवीजन समेत वन्य जीवों के लिहाज से संवेदनशील राजा जी नेशनल पार्क, नंदा देवी बायोस्फीयर पार्क, जिम कार्बेट टाइगर रिजर्व पार्क को भी शामिल किया गया है।
एक शोध शुरू किया जा रहा है। इसका मकसद पहाड़ से पलायन व मानव वन्य जीव संघर्ष की रोकथाम है। फिलहाल संघर्ष की घटनाओं का समूचा ब्योरा जुटाया जा रहा है। इससे टकराव को रोकने की ठोस योजना तैयार की जाएगी।
-संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक वन अनुसंधान केंद्र हल्द्वानी