जंगल के अंदर होने वाली लीज खेती बंद होने के बेहतर परिणाम सामने आये हैं। जिस प्रभाग में मुश्किल से दो से तीन बाघ होने की बात कही जाती थी, उस तराई केंद्रीय वन प्रभाग में बाघों की संख्या तीन से चार गुना तक बढ़ गई है। यह अब तक की सबसे ज्यादा संख्या मानी जा रही है।
करीब 30 साल पहले वन विभाग ने जंगल में लीज खेती का फार्मूला निकाला। इसमें तराई के जंगलों (पश्चिम वृत्त) में करीब 1500 हेक्टेयर में गेहूं, सोयाबीन ठेकेदार उगाता था। साथ में वह खेतों के बीच ही वन विभाग के प्लांटेशन (पौधे लगाने), उनकी सुरक्षा, सिंचाई आदि सभी काम करता था। इसके अलावा राजस्व भी देता था।
पर इसकी आड़ में जमकर अंधेरगर्दी होती थी। ठेकेदार और उनके कर्मचारियों पर जंगल में अवैध शिकार, लकड़ी कटाने, शोर-शराबा करने के आरोप लगते थे। इसके अलावा खेती के लिए कीटनाशक, यूरिया आदि डालने से जंगल की जमीन भी खराब होती थी। खेती नियमों को ताक पर रखकर होती थी। इस मामले की जांच केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने शुरू की। मंत्रालयों के प्रयास के बाद 2009 में खेती बंद हुई।
डीएफओ तराई पूर्वी डा. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि खेती बंद होने के परिणाम बेहतर आये हैं। पहले जंगल में क्लोन यूकेलिप्टस के पौधों का रोपण होता था, अब मिश्रित वन लगाये जा रहे हैं। इसमें फल समेत दूसरी प्रजातियां हैं। इससे जंगल में हरियाली बढ़ी है। हरियाली से बढ़ने और व्यवधान कम होने से हिरन, काकड़ समेत दूसरे वन्यजीवों की संख्या में वृद्धि हुई है।
तराई केंद्रीय वन प्रभाग एसडीओ आरसी कांडपाल कहते हैं कि लीज खेती करने वालों के वाहन दिन भर चलते रहते थे। इससे शोर होता था और जंगल की शांति प्रभावित होती थी। अब स्थितियां बदल गई हैं। हरियाली से ज्यादा सुधार वन्यजीवों की संख्या में हुआ है। हिरन, हाथी समेत दूसरे वन्यजीवों के झुंड और अच्छी खासी संख्या देखी जा रही है। डीएफओ तराई केंद्रीय सनातन कहते हैं कि बाघ समेत जितने वन्यजीव रिपोर्ट हुए हैं, वह हमारे अनुमान से काफी ज्यादा हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन की तैयारी
हल्द्वानी। वन विभाग अब लीज खेती बंद होने का विधिवत वैज्ञानिक अध्ययन कराने की तैयारी कर रहा है। डीएफओ धकाते कहते हैं कि इस काम में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया से मदद ली जाएगी।