प्रदेश में किसान एक केबाद एक आत्महत्या कर रहे हैं और सत्तारूढ़ दल को इसमें सियासत खोजने से ही फुर्सत नहीं मिल रही है। प्रदेश सरकार के मंत्री बेतुके बोल से तक परहेज नहीं कर रहे हैं।
हाल यह है कि किसी को सुसाइड नोट न मिलने से किसानों की आत्महत्या पर शक है तो किसी को लगता है कि किसान दो-चार लाख रुपये के लिए आत्महत्या क्यों करेंगे जब उनके पास करोड़ों की जमीन है।
प्रदेश में प्रगतिशील किसान उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। ये किसान हैं जो आधुनिक तकनीक अपना रहे हैं, सामाजिक सुरक्षा का लाभ ले रहे हैं और सत्ता पक्ष में भी पैठ रखते हैं। प्रदेश में करीब 93 प्रतिशत किसान सीमांत किसानों की श्रेणी में आते हैं और खेती में हो रहा बदलाव उनकी कमर तोड़ रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक शहरी जीवन शैली की चाहत, ज्यादा सुविधाओं का दबाव किसानों पर भी है। मुसीबत यह है कि खेती से वापसी लगातार कम होती जा रही है। जिस जमीन को किसान जान से ज्यादा प्यार करता है, उसी जमीन केदाम तेजी से बढ़ रहे हैं और भू माफिया, विकास योजनाओं को अमली जामा पहनाने वाले योजनाकारों की निगाह इस भूमि पर है।
कभी सड़क तो कभी औद्योगिक क्षेत्र के नाम पर सरकार भी कृषि भूमि का अधिग्रहण करने से नहीं चूकती। किसान अपनी जमीन बचाएं, शहरी जीवन शैली को अपनाने की मजबूरी के आगे घुटने टेक दें या फायदा न दे पाने वाली खेती करना छोड़ दे। किसान इस कशमकश से जूझ ही रहा है।
इसके उलट प्रदेश सरकार किसानोें की समस्याओं को नजरअंदाज कर इसमें सियासत खोज रही है। कांग्रेस का राज्यपाल का दिया गया ज्ञापन सत्ता पक्ष को किसानों के ज्ञापन से ज्यादा विचलित कर रहा है। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल तो अभी तक समझ ही नहीं पाए हैं कि किसान आखिर आत्म हत्या क्यों कर रहे हैं।
हल्द्वानी में ही एक कार्यक्रम में आये कृषि मंत्री ने यह कहने में परहेज नहीं किया कि किसान दो चार लाख रुपये के लिए आत्म हत्या क्यों करेंगे। साफ है कि किसानों पर चौतरफा दबाव की या तो कृषि मंत्री को जानकारी नहीं है या फिर वे इस तरह के मामले को नजरअंदाज करना बेहतर समझ रहे हैं।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भी यह कहकर फंसे थे कि किसानों की आत्महत्याओं के मामले में सुसाइड नोट तो मिल ही नहीं रहे हैं।