दमुवाढूंगा के लोगों को नये साल का तोहफा सरकार ने दिया है। शासन ने 573 एकड़ के इलाके को आरक्षित वन भूमि से बाहर कर दिया है।
इसका नोटिफिकेशन भी जारी हो गया है। अपर सचिव वन मनोज चंद्रन ने इस नोटिफिकेशन की पुष्टि की है। इस आदेश के बाद लोगों को जमीन पर मालिकाना हक का रास्ता साफ हो गया है।
दमवाढूंगा के लोग लंबे समय से इलाके को राजस्व गांव घोषित करने की मांग कर रहे थे। यह मामला कोर्ट में भी गया था। इसके बाद शासन ने 680 एकड़ का इलाके का सर्वे कराया। सेटेलाइट मैप देने से लेकर सर्वे आफ इंडिया के 1965 का नक्शा देखा गया।
सर्वे आफ इंडिया के नक्शे में पीले रंग, सफेद और हरे रंग से इलाके को दिखाया गया था। अधिकारियों के अनुसार क्योंकि पीले रंग का मतलब कृषि भूमि होता है, जो दर्शाता है कि उस समय यह भूमि खेती के उपयोग आ रही थी।
इसके मद्देनजर इलाके को आरक्षित वन भूमि घोषित करने की जो प्रक्रिया 1999 में फारेस्ट सेटेलमेंट आफिसर (एफएसओ) की रिपोर्ट और वन अधिनियम की धारा-4 के तहत शुरू हुई थी, वह तकनीकी रूप से सही (खेती वाली भूमि को वन भूमि घोषित नहीं किया जा सकता है) नहीं थी।
इसके अलावा इलाके को 2007 के बाद आरक्षित वन भूमि घोषित करने की (वन अधिनियम 1927 की धारा-20 के तहत) की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में जाकर इलाके को डिनोटिफाइड कराने की भी जरूरत नहीं है।
शासन ने सर्वे, रिपोर्ट के आधार और मुख्यमंत्री हरीश रावत, वन मंत्री दिनेश अग्रवाल के निर्देश पर 573 एकड़ इलाके को वन भूमि से बाहर कर दिया जाता है। अब आगे शासन जमीन को राजस्व या अन्य क्षेत्र घोषित करने का अधिकार होगा।
शासन ने इलाके का व्यापक सर्वे करने के साथ अभिलेखों का परीक्षण किया है। इसमें हल्दी खाल, दमुवाढूंगा का फायर लाइन से ऊपरी क्षेत्र और जमरानी कालोनी के ऊपर के इलाके में वन महकमे के प्लांटेशन के साक्ष्य आदि मिले हैं। इसके बाद यह इलाका आरक्षित वन भूमि में आएगा।