कुमाऊं के सबसे बड़े सुशीला तिवारी अस्पताल को बदहाल करने में डॉक्टर ही अहम भूमिका निभा रहे हैं। डाक्टरों को न तो चिकित्सा-शिक्षा सचिव का डर है और न ही चिकित्सा-शिक्षा निदेशक की परवाह। तीन सप्ताह से आपरेशन की बांट जोह रही एक महिला को शनिवार को सुशीला तिवारी अस्पताल से बैरंग लौटा दिया गया।
सुशीला तिवारी अस्पताल व्यवस्थाओं और अच्छाई के लिए कम बल्कि अव्यवस्थाओं एवं विवादों के नाम से पहचान बना चुका है। तमाम प्रयासों के बावजूद अस्पताल के आंतरिक हालात नहीं सुधर रहे हैं और कुछ डॉक्टरों की मनमर्जी मरीजों पर भारी पड़ रही है। नेपाल निवासी जानकी (35) को रीढ़ की हड्डी में दर्द था।
जानकी को सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। न्यूरो में ऑपरेशन न होने के कारण ही असिस्टेंट प्रोफेसर/न्यूरो सर्जन डॉ. मिथिलेश पांडे ने इस्तीफा दे दिया था। मामले के तूल पकड़ने के बाद चिकित्सा-शिक्षा सचिव/मंडलायुक्त डी सैंथिल पांडियन ने चिकित्सा-शिक्षा निदेशक डॉ. आशुतोष स्याना को तलब कर लिया था।
दो दिन पहले शुक्रवार को डॉ. स्याना ने न्यूरो सर्जरी के लिए एनस्थीसिया से एक असिस्टेंट प्रोफेसर और सर्जरी विभाग से एक पीजी जेआर दिलाया था। कहा था कि न्यूरो सर्जरी टलने पर असिस्टेंट प्रोफेसर की जवाबदेही होगी। मामला निपटने के 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि शनिवार को जानकी को हायर एनस्थीसिया और कार्डिक चेकअप की सलाह देते हुए सर्जरी में पेच फंसा दिया गया।
डॉ. पांडे ने बताया कि हायर एनस्थीसिया और कार्डिक चेकअप लिखे जाने के कारण सर्जरी नहीं हो सकी। शनिवार को जानकी को डिस्चार्ज कर दिया गया। डाक्टरों की संवेदनहीनता के चलते एक मरीज को फिर बिना इलाज के ही अस्पताल से जाना पड़ा। सवाल ये उठता है कि अस्पताल में मनमानी कर रहे ऐसे डाक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती है।
पुराना मामला निपटाने के बाद फिर से मरीज की सर्जरी न होना अत्यंत गंभीर मामला है। चिकित्सा-शिक्षा सचिव को पूरे मामले से अवगत कराया जाएगा और सख्त कार्रवाई करने के लिए कहा जाएगा।
डॉ. आशुतोष स्याना, निदेशक, चिकित्सा-शिक्षा
मामला मेरे संज्ञान में आया है। चिकित्सा-शिक्षा निदेशक के साथ इस मामले में बैठक की जाएगी और अस्पताल में व्यवस्था बनाने के लिए सख्त कदम उठाया जाएगा।
डी सैंथिल पांडियन, चिकित्सा-शिक्षा सचिव/मंडलायुक्त