नैनीताल। हिमालयन इको संस्था की ओर से कला और साहित्य विषयक दो दिनी कुमाऊं फेस्टिवल ऑफ लिटरेचर शनिवार से शुरू हो गया है। इसमें देश-विदेश से आए लेखक एवं साहित्यकार हिस्सा ले रहे हैं। पहले दिन साहित्य एवं कला जगत से ताल्लुक रखने वालों ने मौजूदा समय में लेखन और साहित्य का कार्य को चुनौतीपूर्ण बताया।
मल्लीताल स्थित प्रसादा भवन में आयोजित सम्मेलन में संस्था की निदेशक जान्हवी प्रसाद ने कहा कि इस सम्मेलन को प्लास्टिक फ्री फेस्टिवल के रूप में मनाया जा रहा है। इसके माध्यम से नए लेखकों, स्कूली बच्चों और अन्य लोगों को साहित्य के बारे में सीखने के नए अवसर मिलेंगे। उद्घाटन अवसर पर अधिकतर लेखकों एवं साहित्यकारों ने अपने लेखन और साहित्य के बारे में बताया। इस मौके पर पूर्व सांसद जतिन प्रसाद, अदिति माहेश्वरी गोयल, अनिल बिष्ट, कैथी मैक्लोफ, सामीन ओ ब्रायन, दलीप अकोई, केट न्यूमन, दीपा अग्रवाल, लीसा चोईगाल, अंकिता सिंह, किवा सिंह, सुखमय मजूमदार, अमिताब बाघेल आदि थे।
- कोट
यह एक साहित्यिक मेला है, जिसमें सभी साहित्यकारों को एक-दूसरे से कुछ न कुछ सीखने का मौका मिलेगा। साहित्य के दौर की बात करूं तो कुछ चीजें साहित्य को आगे बढ़ा रही हैं, लेकिन कुछ चीजें साहित्य को पीछे भी खींच रही हैं। युवाओं के हाथ में मोबाइल आने से साहित्य की पहुंच तो बढ़ी है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि साहित्य को कितने लोग पसंद कर रहे हैं। लिखने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी होना जरूरी है। मुझे नहीं लगता कि हमारे समाज के हर तबके को पूर्ण अभिव्यक्ति की आजादी है। -प्रो.पुष्पेश पंत, खानपान विशेषज्ञ।
- कोट
मैने यात्रा वृत्तांत पर ही ज्यादातर किताबें लिखी हैं। पर्यावरण, पेड़-पौधे, पक्षी आदि को लेकर ही मैने लिखने की कोशिश की है। यात्राओं के दौरान मैने यह भी देखा है कि लोगों में पर्यावरण को लेकर रुचि कम हो रही है। हिमालयन वैली का तेेजी से विनाश हो रहा है। इसे बचाना जरूरी है, लेकिन हिमालयन वैली के जिन क्षेत्रों में अब तक कोई हस्तक्षेप नहीं है, पहले उसे बचाना जरूरी है। मैने वाइल्ड हिमालया नाम से एक किताब लिखी है, जिसमें हिमालय से जुड़े हर तथ्य पाठकों को पढ़ने के लिए मिलेंगे। इस किताब में कुमाऊं, गढ़वाल, अरुणांचल प्रदेश, नेपाल, भूटान आदि क्षेत्रों का भ्रमण कर वहां की समस्याएं भी लिखी हैं। -स्टीफन ऑल्टर लेखक।
-कोट
मैं मुख्य रूप से एक न्यूरोलॉजिस्ट हूं, लेकिन भ्रमण करना मेरे जीवन का मुख्य पक्ष रहा है। मैं अब तक लगभग 35 पैदल ट्रैक कर चुका हूं। मेरे द्वारा लिखे लेख पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित हुए हैं। मेरी लिखी दो किताबें (यात्रा वृत्तांत) दर्रा-दर्रा हिमालय का एवं दरकते हिमालय लोगों को बहुत पसंद आई। मेरे हर ट्रैक में मेरी पत्नी मेरे साथ रहती है। मुझे प्रकृति से बहुत लगाव है। इसलिए मैं प्रकृति के बारे में लिख पाता हूं। -अजॉय सोडानी लेखक।
-कोट
मैं एक उर्दू शायर हूं। दिल्ली के शायरों पर मैने अपनी किताब लिखी हैं, अगर आज साहित्य की बात की जाए तो युवाओं तक इंटरनेट के माध्यम से साहित्य आसानी से पहुंच जाता है। आज हर युवा गालिब की शायरी से वाकिफ हैै। ये समय लिखने वालों के लिए बहुत कठिन है, क्योंकि लिखने वाला नहीं जानता कि पढ़ने वाले को क्या पसंद है। -शैफ महमूद उर्दू शायर।
- कोट
मैं बच्चों के लिए ज्यादातर किताब लिखती हूं। अब तक लगभग 50 किताबें लिख चुकी हूं। मेरी हमेशा यह कोशिश रहती है कि मैं बच्चों के मतलब की किताब लिख सकूं। बच्चों की रुचि देखते हुए लिखना बहुत जरूरी है। मेरा प्रयास रहता है कि मैं बच्चों को किताबों से जोड़ने के लिए किताबों को रंग-बिरंगे चित्रों से भर दूं, ताकि बच्चों को किताबें अच्छी लगें। -दीपा अग्रवाल लेखिका।