राज्य सभा की खाली सीट पर कब्जे के लिए कांग्रेस कुनबे को इस बार अंदरूनी शक्ति परीक्षण के दौर से भी गुजरना पड़ सकता है। करीब दर्जन भर नामों में कुमाऊं से भी कुछ नाम तेजी से उभर कर सामने आ रहे हैं। समय की नजाकत को देखते हुए अभी दावेदारी का इजहार खुलकर नहीं किया जा रहा है।
कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस में इस समय क्षेत्रीय संतुलन को भी तवज्जो दी रही है। कुमाऊं से महेंद्र सिंह माहरा पहले ही राज्यसभा में हैं। ऐसी स्थिति में गढ़वाल को तवज्जो देने की बात भी की जा रही है। इतना होने पर भी पिछले कुछ समय से अलग-थलग पड़े दो नाम हैं जो कुमाऊं से उभर तक सामने आने की कोशिश में है। पूर्व सांसद महेंद्र पाल सिंह के समर्थक पूर्व सांसद को आगे करने की कोशिश में है। महेंद्र पाल सिंह अपनी शालीनता के कारण कांग्रेस में स्वीकार्य भी हैं।
महेंद्र पाल ने लोक सभा चुनाव के दौरान भी टिकट मांगा था पर केसी सिंह बाबा के चलते महेंद्र पाल को मायूसी का सामना करना पड़ा था। दूसरी ओर, कांग्रेस के तेजतर्रार नेता तिलक राज बेहड़ हैं जो लोक सभा चुनाव में अपनी दावेदारी को पुख्ता नहीं कर पाए थे। अब बेहड़ के समर्थक भी बेहड़ को आगे करने की कोशिश में है। खुद बेहड़ का कहना है कि उनकी पूरी कोशिश होगी पर हाईकमान का कोई भी फै सला उन्हें स्वीकार्य होगा।
राज्य सभा की खाली हुई सीट पर कांग्रेस ने पूर्व में मनोरमा डोबरियाल शर्मा को टिकट देकर यह संकेत देने की कोशिश भी की थी कि राज्यसभा में सिर्फ हैवीवेट का कब्जा नहीं है। मनोरमा शर्मा डोबरियाल के निधन से रिक्त हुए स्थान पर राज बब्बर को मौका दिया गया। अब कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व भी मान रहा है कि पैराशूट प्रत्याशी से प्रदेश में कांग्रेस को फायदा कम और नुकसान ज्यादा है। इस बार भी पैराशूट प्रत्याशी को लेकर खासा विरोध है। अंदरखाने कांग्रेस का पूरा नेतृत्व इस बात को लेकर एकजुट है कि बाहर के प्रत्याशी को टिकट न दिया जाए।
कांग्रेस का एक धड़ा पार्टी प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की दावेदारी को खासा मजबूत मान रहा है। किशोर की दावेदारी में अड़चन है तो सिर्फ इतनी कि किशोर संगठन भी संभाल रहे हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले संठगन में बदलाव को कई नेता अंदरखाने सही भी नहीं मान रहे हैं। खासकर जब किशोर अपने हिसाब से संगठन को ढाल भी चुके हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए राज्यसभा की दावेदारी में पीडीएफ भी एक अड़चन बन सकती है। पीडीएफ ने अभी खुलकर अपनी दावेदारी नहीं की है पर पीडीएफ बुरे वक्त में साथ देने का प्रतिफल मांगने के संकेत तो दे ही रहा है। इतना होने पर भी कांग्रेस इस मामले को तुरंत ही फैसला लेने के पक्ष में नहीं है। शक्ति परीक्षण की आशंका को देखते हुए फिलहाल नामांकन तक इस मामले को टालने पर जोर दिया जा रहा है।