सौ साल पहले अंग्रेजों का बसाया ‘छोटी हल्द्वानी’ गांव बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा समेत तमाम मूलभूत सुविधाओं को मोहताज हो गया है। प्रशासनिक उपेक्षा के चलते ‘छोटी हल्द्वानी’ अपनी ऐतिहासिक पहचान खोता जा रहा है।
क्षेत्रवासी जंगली जानवरों की दहशत के बीच जी रहे हैं। ‘छोटा हल्द्वानी’ की पहचान इसे बसाने वाले नैनीताल में जन्मे जिम कार्बेट से जुड़ी है। इस विरासत को बचाने के लिए ‘छोटा हल्द्वानी’ को आधारभूत सुविधाओं की दरकार है।
‘छोटा हल्द्वानी’ गांव को 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में जन्मे जिम कार्बेट ने 1915 में बसाया था। जिम कार्बेट ने गुमान सिंह बरुआ नामक व्यक्ति से 1500 रुपये में 221 एकड़ भूमि खरीदी थी। आजादी के बाद 40 परिवारों को वह यहां लेकर आए और उन्हें बसाया। अफ्रीका से मक्का और चने का बीज लाकर लोगों को खेती के गुर सिखाए।
गांव के प्रति अत्यधिक लगाव के चलते कार्बेट अपनी मृत्यु से पहले तक ग्रामीणों के लिए लगान भेजा करते थे। 19 अप्रैल 1955 में उनकी मृत्यु के बाद उनकी बहन मैगी ने भी लंबे समय तक लगान भेजा। कार्बेट का बसाया यह ऐतिहासिक और आदर्श गांव आज मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है।
जंगली जानवरों से फसलों को व्यापक नुकसान हो रहा है। जंगली जानवरों से फसलों को बचाने के लिए बनाई गई सुरक्षा दीवार भी टूट गई है।
प्रशासन ग्रामीणों की फसलों को बचाने के लिए सुरक्षा के प्रबंध करे। कालाढूंगी में हल्दू के पड़ों की अधिकता के साथ ही हल्दी का काफी अधिक मात्रा में उत्पादन होता है।
इसका नाम छोटी हल्द्वानी रखे जाने की वजह क्षेत्रवासी बताते हैं कि कार्बेट द्वारा बसाए गए इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व और व्यापारिक क्षेत्र के विकसित हो रहे हल्द्वानी को देखते हुए इसका नाम छोटी हल्द्वानी रखा।
कार्बेट ग्राम विकास समिति के सचिव राजकुमार पांडे बताते हैं कि नैनीताल के जिला और कमिश्नरी मुख्यालय होने से तब लोग कालाढूंगी होकर नैनीताल जाते थे।
तब हल्द्वानी से नैनीताल को कोई सड़क नहीं थी। हल्द्वानी से नैनीताल आने-जाने वाले लोग एक दिन यहां रुकते थे। तब यहां रुकने वाले लोगों द्वारा ही इसे छोटी हल्द्वानी नाम दिए जाने की बात सामने आई है।