विधानसभा चुनाव से ठीक पहले धारी तहसील परिसर और आसपास में भाकपा (माओवादी) की ओर से की गई गतिविधि ने पुलिस-प्रशासन के साथ ही खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरे प्रकरण में धारी तहसील के राजस्व विभाग की भी बड़ी लापरवाही सामने आ गई है।
तहसील में ड्यूटी कर रहे गार्ड का कहना है कि उसने तो दीवारों पर नारे लिखने संबंधी जानकारी बुधवार रात 9:45 बजे ही तहसीलदार को दे दी थी, जबकि तहसीलदार का कहना है कि उन्हें रात 2:30 बजे सूचना मिली। माओवादियों द्वारा दीवारों पर नारे लिखे जाने संबंधी जानकारी बीती रात सबसे पहले वहां रात की ड्यूटी पर तैनात गार्ड गिरीश चंद्र आर्य को हुई।
गार्ड ने बताया कि जब वह खाना खाकर लौट रहा था, तब उन्होंने दीवारों पर भाकपा लिखा देखा, जिसकी सूचना उन्होंने करीब 9:45 बजे ही तहसीलदार को दे दी थी। सूचना देने के बाद वह तहसील के दूसरे हिस्से में चला गया। उक्त गार्ड जब मीडिया से जुड़े लोगों को घटना की जानकारी दे रहा था, तभी सामने मौजूद किसी व्यक्ति ने उसे इशारे से मीडिया कर्मियों को कुछ भी बताने से इनकार कर दिया।
इशारा मिलते ही गार्ड वहां से दूसरी ओर चला गया। बताया जाता है कि उक्त सूचना मिलने के बाद भी कई घंटे तक राजस्व विभाग का कोई अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। रात ढाई बजे के करीब राजस्व विभाग के अधिकारी और कुछ कर्मचारी मौके पर पहुंचे। तब तक मौके पर जिप्सी में आग सुलग रही थी। जिसे इन्हीं लोगों ने बुझाया।
मौके पर लगाए गए पोस्टर और दीवारों पर लिखे नारों से लगता है कि इस काम को एक दो लोगों ने नहीं बल्कि इससे कहीं अधिक लोगों ने अंजाम दिया है। इस घटना के बाद से धारी और इसके आसपास के क्षेत्र के लोगों में दहशत भी है।
लोगों का मानना है कि यदि राजस्व विभाग के अधिकारी सूचना मिलने के तत्काल बाद मौके पर पहुंचकर कार्रवाई करते तो शायद प्रकरण से संबंधित लोगों को पकड़ा जा सकता था। इस पूरे मामले में घटना के कई घंटे के बाद हरकत में आई पुलिस की अलग-अलग टीमों का रुख जंगलों की ओर हुआ, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।
इस संबंध में तहसीलदार नवाजिश खलीक का कहना है कि उन्हें उक्त मामले की जानकारी रात में 2:30 बजे हुई, जिसके बाद वह घटनास्थल को रवाना हो गए थे। बहरहाल पूरे मामले में खुफिया तंत्र का फेल होना उजागर हुआ है।
ऐसा इसलिए क्योंकि चुनाव से ऐन पहले पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों ने कई दौर की बैठकें कर महकमे से जुड़े कर्मचारियों के साथ खुफिया तंत्र को भी अलर्ट रहने के निर्देश दिए थे, ताकि चुनाव के दौरान कहीं कोई कानून व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ने का प्रयास न कर सके।
इसके बावजूद खुफिया तंत्र से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को इस घटना की भनक तक नहीं लगी। खुफिया विभाग के कई कर्मचारी शुक्रवार सुबह मीडिया कर्मियों से घटना की जानकारी जुटाते रहे।
पुलिस की चार टीमें कांबिंग में जुटी
धारी तहसील परिसर और आसपास के क्षेत्रों में माओवाद के नाम से संदिग्ध पोस्टर चिपकाने और नारे लगाने वालों की धरपकड़ के लिए शुक्रवार दोपहर एसएसपी जन्मेजय खंडूरी ने पुलिस की चार अलग-अलग टीमें गठित कीं।
चारों टीमों ने बृहस्पतिवार दिनभर धारी, ओखलकांडा, क्वैरागांव, बनलेखी, बबियाड़, हरिनगर, अक्सोड़ा और आसपास के क्षेत्रों के जंगलों में कांबिंग की। कांबिंग के दौरान पुलिस टीम ने स्थानीय ग्रामीणों से भी किसी संदिग्ध के नजर आने और माओवादी गतिविधियों की जानकारी ली।
खबर लिखे जाने तक पुलिस की टीमें कांबिंग अभियान में जुटी थीं, लेकिन किसी तरह की सफलता नहीं मिली।
तीन साल पहले ओखलकांडा में लगाए थे पोस्टर
धारी तहसील परिसर की तरह ही तीन साल पहले वर्ष 2014 में माओवादी गतिविधियों से संबंधित पोस्टर ओखलकांडा में भी लगाए गए थे। इन पोस्टरों में भी चुनाव बहिष्कार करने और जनयुद्ध में शामिल होने जैसे नारे लिखे थे।
इसके अलावा साल भर पहले भी धारी के जंगलों में संदिग्ध बंदूकधारी नजर आने की सूचना पर पुलिस ने कांबिंग की थी। दोनों मामलों की जांच के भी निर्देश दिए गए थे, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।