कुमाऊं का सबसे बड़े और एक मात्र कैंसर अस्पताल ही ‘बीमार’ है। स्वामी राम कैंसर इंस्टीट्यूट में मेडिकल और सर्जिकल आंकोलॉजी विशेषज्ञ नहीं हैं। रेडियोथैरेपी विशेषज्ञों के सहारे इंस्टीट्यूट चल रहा है।
स्वामी राम कैंसर इंस्टीट्यूट का निर्माण 2008 में शुरू हुआ था। इंस्टीट्यूट 2010 में बनकर तैयार हुआ। 2010 में ही कैंसर मरीजों के लिए इसका शुभारंभ किया गया। मशीनों की खरीद और भवन निर्माण में लगभग 30 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। चार साल बाद भी इंस्टीट्यूट में वार्ड नहीं बन पाया है।
25 बेड के इंस्टीट्यूट में प्रतिवर्ष कुमाऊं से 12 सौ मरीज आते हैं। इंस्टीट्यूट में ट्यूमर प्लानिंग सिस्टम, लिनयर एक्सीलेटर और ब्रेकी थैरेपी जैसी महंगी एवं आधुनिक मशीनें हैं। इंस्टीट्यूट में डा. केसी पांडे, डा. निर्दोष पंत और डा. स्वरूप रेडियोथैरेपी विशेषज्ञ हैं। पहाड़ से आने वाले मरीजों को रेडियोथैरेपी विशेषज्ञ डाक्टरों से काम चलाना पड़ रहा है। यही डाक्टर ओपीडी में मरीजों को देखते हैं।
सरकार मरीजों के लिए एक भी मेडिकल और सर्जिकल आंकोलाजी विशेषज्ञ मुहैया नहीं करा पाई है। मरीजों को कैंसर के इलाज के लिए देहरादून या निजी अस्पतालों में जाना पड़ रहा है। मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. आरसी पुरोहित का कहना है कि स्टेट कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट बनने के बाद मेडिकल और सर्जिकल विशेषज्ञ रखे जाएंगे। उन्होंने बताया कि वन भूमि हस्तांतरित न होने के कारण अब तक वार्ड नहीं बन पाया है।