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जंगल, ग्लेशियरों, बुग्यालों का अस्तित्व खतरे में

Sat, 01 Apr 2017 01:11 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल।  
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court shimla
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नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को राज्य के समस्त ग्लेशियरों, नदियों, जलधाराओं, छोटी नदियों, घास के मैदानों, जंगलों, स्रोतों, घाटियों और यहाँ तक कि हवा को भी जीवित व्यक्ति का दर्जा देकर एक बार फिर से विकास बनाम पर्यावरण के विमर्श को जिंदा कर दिया है।
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गंगा और यमुना नदी पर इसी तरह का फैसला हाल ही में कोर्ट ने दिया था। कोर्ट ने इस निर्णय तक पहुंचने में न केवल जबरदस्त संवेदना दिखाई है, बल्कि इसके संबंधित न्यायाधीशों का पीछे गहन अध्ययन भी साफ़ नजर आता है।

जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस आलोक सिंह की खंडपीठ ने अपने 66 पृष्ठों के निर्णय में चिपको आंदोलन सहित विश्व की तमाम पर्यावरणीय गोष्ठियों, घोषणाओं, प्रथाओं, मान्यताओं, सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के मुख्य बिंदु उद्धृत किये हैं।
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कोर्ट ने कहा है कि पिछली पीढ़ी ने हमें धरती माता सुरक्षित सौंपी है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसी स्वरूप में इसे भावी पीढ़ी को हस्तांतरित करें। कोर्ट ने वनों, नदियों, ग्लेशियरों, झीलों, हवा, जीव जंतुओं आदि के जीवन के अधिकार को मान्यता देने और उन्हें सुरक्षा देने पर जोर देते हुए कहा है कि आज इन सबका अस्तित्व खतरे में है। इसका जिम्मेदार मनुष्य है जो अतिक्रमण कर रहा है।

जस्टिस शर्मा और जस्टिस सिंह ने निर्णय में वृक्षों के महत्व को विस्तार से उकेरा गया है। उन्होंने वृक्षों को ग्लेशियरों का रक्षा कवच, मनुष्य सहित विभिन्न जीवों का रक्षक, जल संग्रहण का स्रोत बताते हुए कहा है कि बांज का एक पेड़ 75 हजार गैलन पानी स्टोर करने की क्षमता रखता है।

पेड़ ग्लोबल वार्मिंग व कार्बन कवर नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्षों का आध्यात्मिक महत्व रेखांकित  करते हुए कोर्ट ने वृक्ष पूजा, वनदेवी, अरण्यी संस्कृति की चर्चा करते हुए गौतम बुद्ध और महावीर को वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त होने का उदाहरण देकर इनके महत्व को उकेरा है।

कोर्ट ने पर्यावरण सुरक्षा को संवैधानिक, वैधानिक और नैतिक दायित्व बताया। कोर्ट ने चिपको आंदोलन में गाये जाने वाले जनगीतों और चिपकों से जनसामान्य के जुड़ाव, 1968 के तिलाड़ी घोषणापत्र, लाता के महिला आंदोलन का हवाला देने सहित पर्यावरण संरक्षण में सुंदरलाल बहुगुणा की भी सराहना की है।
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