स्वरोजगार करने वालों के लिए कोई काम मुश्किल नहीं होता। अमर दा इसके जीवंत उदाहरण हैं। चरवाहा अमर दा ने जंगलों में ही घी का कुटीर उद्योग खड़ा कर नौकरी के लिए दर दर भटकने वाले पढ़े-लिखे युवाओं को आइना दिखाने का काम किया है। अमर दा कोटाबाग के टीट खेत (बुग्याल) में महीनों अपने भैंसों के साथ रहते हैं। जंगलों में मवेशियों के दूध और दही से घी बनाते हैं। घी की सप्लाई कोेटाबाग नवोदय स्कूल के बच्चों और राजकीय इंटर कालेज के टीचरों के लिए करते हैं। अमर दा के शुद्ध देशी घी की खुशबू इतनी दूर तक चली गई कि बाहर की सप्लाई पूरी नहीं कर पाते हैं।
थौ खेत, स्यात कोटाबाग के चरवाहे अमर सिंह बिष्ट की 15 भैंसें हैं। अमर सिंह की आजीविका इन्हीं भैंसों पर निर्भर हैं। अमर सिंह अपनी भैंसों को लेकर मार्च में टीट के जंगलों में निकल पड़ते हैं। जुलाई में बारिश शुरू होने के बाद घर को लौट आते हैं। भैंसों की पहरेदारी के लिए दो कुत्ते और खुद की सवारी के लिए एक घोड़ा साथ रखते हैं। अमर दा के चार महीने जंगलों में ही गुजरते हैं। हर 15 दिन में जंगलों में मवेशियों के घास चरने के साथ पड़ाव भी बदलते रहता है। डेरा वहीं डालते हैं जहां मवेशियों और खुद के लिए पीने का पानी का स्रोत मिलता है।
अमर दा के मवेशियों का झुंड आजकल टीट खेत (बुग्याल) में है। यह बुग्याल मवेशियों के चरने का अब आखिरी ठिकाना बचा है। अमर दा बताते हैं, जंगल में ही मवेशियों के दूध और दही से घी और मक्खन बनाते हैं। चार महीनों में 55 से 60 किलो घी बना लेते हैं और मक्खन अलग से। 500 रुपये किलो घी बेचते हैं। घी के लिए कोटाबाग नवोदय और राजकीय इंटर कॉलेज से एडवांस बुकिंग हो जाती है। इन स्कूलों के टीचर सालों पुराने ग्राहक हैं। अमर दा बताते हैं 15 वें दिन में बच्चे घर से राशन पहुंचाने जंगल आते हैं। राशन पहुंचाने के बाद घर लौटते वक्त घी ले जाते हैं। जिन लोगों की एडवांस बुकिंग होती है बच्चे उन्हें घी की डिलीवरी कर देते हैं। अमर सिंह बताते हैं, जंगलों में मवेशियों के साथ दो दशक गुजार दिए हैं। इतने सालों में कई खूंखार जंगली जानवरों से सामना हुआ है, लेकिन कभी किसी ने हमला नहीं किया। हालांकि, जंगली जानवरों के हमलों में कई मवेशियों को गंवा चुके हैं।
जानवरों की आहट महसूस कर लेते हैं अमर दा
अमर सिंह 10वीं पास हैं। उनकी अपनी दुनिया है। अमर दा मौसम की करवट और जानवरों की आहट को महसूस कर लेते हैं। कई जानवर तो उनके संकेत तक समझते हैं। वो कभी बीमार नहीं पड़ते। एक टार्च, एक गड़ासा और एक छाता ही उनका हथियार है।