नैनीताल। कव्वाली सूफीवाद और सूफी परंपरा के अंतर्गत भक्ति संगीत की एक धारा के रूप में उभरकर आई। इसका इतिहास सात सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। वर्तमान में यह भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित अन्य देशों में संगीत की एक लोकप्रिय विधा है। कव्वाली का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप फतेह अली खान के गायन से सामने आया।
यह कहना है सहारनपुर निवासी अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कव्वाल असलम साबरी का। बुधवार को शरदोत्सव में प्रस्तुति के लिए यहां पहुंचे असलम साबरी ने खास मुलाकात में बताया कि मां-पिता की दुआओं से उन्होंने कव्वाली गायकी के सफर की शुरुआत की और आज यह मुकाम हासिल किया। बताया हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने कौमी एकता के लिए हिंदी जबान में कव्वाली को बढ़ावा दिया। 13वीं सदी में हजरत अमीर खुसरो ने ख्वाजा की सोच को आगे बढ़ाया। बोले, खुदा की नेमत (सुरीली आवाज) और रागों की जानकारी के बाद हृदय की गहराइयों से गाई कव्वाली अजर-अमर हो जाती है, लेकिन कम जानकारी वाले इस फन के लोगों ने ही कव्वाली को नुकसान पहुंचाया है। संरक्षण बाबत पूछने पर कहा कि निजी स्तर पर वह इसके लिए प्रयासरत है। उन्होंने 1989 में ‘वृहद कव्वाली तब और अब’ कार्यक्रम भी करवाया था, लेकिन स्थायी संरक्षण के लिए सरकारी पहल की दरकार है। रेडियो में गूंजने वाले संगीत को गुरु मानकर कव्वाली की शुरुआत करने वाले असलम अब तक अमेरिका, अफ्रीका, अफगानिस्तान, इराक, ईरान, मक्का-मदीना समेत कई देशों में अपनी प्रस्तुति देकर अमिट छाप छोड़ चुके हैं।