नैनीताल। वैश्विक टीएमटी परियोजना में भारत के डायरेक्टर प्रो. ईश्वर रेड्डी ने कहा कि विश्वभर में खगोल विज्ञान जगत की चुनौतियों पर खरे उतरकर समय से गुणवत्ता परक निर्माण देश का मुख्य लक्ष्य है। इसी के अनुरूप यूएसए में 2023 में स्थापित की जाने वाली टीएमटी (थर्टी मीटर टेलीस्कोप) निर्माण के लिए देश के वैज्ञानिकों की ओर से कवायद की जा रही है।
आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज में ‘टीएमटी : चुनौती और अवसर’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में बतौर मुख्य वक्ता प्रो. रेड्डी ने कहा कि वर्ष 2007 से इसके लिए कवायद शुरू हुई। विश्व भर में स्थापित टेलीस्कोप के गहन अध्य्यन और शोध के आधार पर इसका डाक्यूमेंटेशन तैयार किया गया। जिसके आधार पर केंद्र सरकार की ओर से 24 सितंबर 2014 को 13 हजार करोड़ के अहम प्रोजेक्ट में 10 फीसदी अर्थात 1300 करोड़ रुपये की भागीदारी के लिए फंड की स्वीकृति हुई। संबंधित धनराशि मिलने के बाद 2014 से 2022 तक आपरेशन होगा, जिसके बाद 2023 से टेलीस्कोप कार्य करने लगेगा।
प्रो. रेड्डी ने बताया कि बीती 7 अक्तूबर को अमेरिका के मोनाकिया हवाईद्वीप में परियोजना का शिलान्यास किया गया। दूरबीन से खगोलविदों को सितारे, आकाश गंगाओं के गठन, ब्रह्मांड के विस्तार के संबंध में गूढ़ जानकारी मिल सकेगी। कुविवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी ने कहा कि खगोल विज्ञान के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने में टीएमटी खासी अहम होगी। इससे पूर्व उन्होंने दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम की शुरुआत की।
डिप्टी डायरेक्टर प्रो.एएन राम प्रकाश ने कहा कि दूरबीन के निर्माण में एडापटिव प्रकाशिकी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। टीएमटी वर्तमान में सबसे बड़ी प्रकाशकीय दूरबीन की तुलना में दस गुना जबकि विश्व की सबसे बड़ी हब्बल दूरबीन की तुलना में 144 गुना अधिक प्रकाश संग्राहक क्षेत्र को धारण करेगा। इस मौके पर कार्यक्रम समन्वयक प्रो. शशिभूषण पांडे ने कार्यक्रम के संबंध में जानकारी दी जबकि डा. महेंद्र सिंह ने अतिथियों का पुष्प गुच्छ से स्वागत किया।
इस मौके पर प्रो. एचपी सिंह, डा. सतीश कुमार समेत आईआईए बंगलूरू, आईयूसीएए पुणे, एरीज के अलावा एसएन बोस इंस्टीट्यूट कोलकाता, गोरखपुर विवि, मुंबई विवि, दिल्ली विवि, कुविवि के प्रतिनिधि मौजूद थे।
भारत की भागीदारी 10 फीसदी
नैनीताल। अंतरराष्ट्रीय स्तर की इस परियोजना में यूएसए की भागीदारी 25 फीसदी, जापान व कनाडा की 20-20 फीसदी, चीन की 15 जबकि भारत की भागीदारी 10 फीसदी है। शेष 10 फीसदी की भागीदारी अमेरिका की नेशनल साइंस फाउंडेशन की है।