हल्द्वानी। सांस्कृतिक समृद्धि की समझ रखने वाले समाज संपन्न होते हैं। समाज एक-दो लोगों से नहीं बनता यह पूरी सभ्यता होती है। सभ्यता तब बची रहती है जब इसकी जड़ों को जोहार समाज की तरह सींचा जाए। पिछले दशकों को देखा जाए तो जोहार घाटी में शौकाओं के सभी गांव आज करीब-करीब खाली हो गए, लेकिन सांस्कृतिक पहचान को आंच नहीं आई। गांव का नाम आज भी इनके नाम के साथ जुड़ा है। हल्द्वानी, देहरादून और लखनऊ जैसे महानगरों में इन्होंने अपनी अलग पहचान स्थापित की है।
शनिवार से हल्द्वानी में जोहार संस्कृति के रंग बिखरे होंगे। ऐसा हर समाज नहीं कर पाता, जबकि हल्द्वानी में कितनी ही जगहों से आकर लोग बसे हैं। सभी की कभी अपनी कोई न कोई पहचान थी। आज बहुत से लोगों को गांव के पास की जगह का नाम याद नहीं, लेकिन जोहार समाज के लोगों के साथ उनके गांव का नाम जुड़ा है। टोला के टोलिया हैं तो बिल्जु बृजवालों का है। पांछू में पंचपाल, मापा में मप्वाल, गनघर में गनघरिया, खिलांच में खिंचियाल, रिलकोट में रिलकोटिया, सुमत में सुमतियाल, लासपा में लसपाल, बुर्फु में बुर्फाल, मार्तोली में मर्तोलिया तो मिलम में धर्मसक्तू, सयाना, पांगती और निखुरपा लोग रहते हैं।
दरअसल, जोहार घाटी के गांव 1962 में भारत-चीन विवाद के बाद खाली होना शुरू हुए। सीमा व्यापार बंद होने के कारण लोगों ने नए क्षेत्र में जगह बनाई, लेकिन गांव और सांस्कृतिक पहचान को नहीं छोड़ा। आज भले ही स्थायी तौर पर प्रवास करने वाले गिनती के परिवार हों, लेकिन अफसर बेटों ने इसे ट्रैकिंग रूट के रूप में विकसित किया। गांव पहुंचकर अपनी धरोहरों को संरक्षित किया। नई पीढ़ी के लिए गांव तीर्थ की तरह हो गए। 39 साल की उम्र में पहली बार अपने गांव टोला जाने वाले एक्जीक्यूटिव इंजीनियर नवीन सिंह टोलिया बताते हैं गांव पहुंचने के लिए 65 किमी तक पैदल चलना पड़ता है। छह दिन में कई पड़ावों से होते हुए गांवों के ही नहीं एक पूरी सभ्यता के दर्शन होते हैं।
मूल गांवों से मीलों दूर निकल चुके जोहार समाज के लोगों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को ही नहीं बचाया बल्कि एक अलग पहचान भी बनाई। जोहार सांस्कृतिक एवं वेलफेयर संगठन के महासचिव भूपेंद्र सिंह पांगती कहते हैं कि समाज के लोगों के दम पर चल रही उनकी संस्था पर्यावरण के लिए भी काम करती है। मुनस्यारी क्षेत्र में हर साल एक वन पंचायत को गोद लेकर वृहद पौधरोपण किया जाता है। घाटी में किसी भी गरीब आदमी के इलाज का जिम्मा भी संगठन उठाता है। यह काम किसी प्रकार की सरकारी मदद से नहीं होते, क्योंकि यह एक समाज की पहचान का मामला है।
गोरी नदी के किनारे फैली है जोहार घाटी
जोहार घाटी के 12 गांव मिलम ग्लेशियर से निकलने वाली गोरी नदी के किनारे बसे हैं। मुनस्यारी से 6 हजार से 10 हजार फीट तक ऊंचाई पर बसे इन गांवों तक पहुंचने के लिए 65 किमी का पैदल सफर तय करना पड़ता है। छह पड़ाव इस सफर में पड़ते हैं। वर्तमान में यह गांव करीब-करीब खाली हो चुके हैं। इसमें करीब एक हजार परिवार हल्द्वानी में बसे हैं।