नैनीताल। प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक प्रो. केएस वल्दिया का कहना है कि भौगोलिक परिवेश के अनुरूप विकास की पहल जरूरी है। हिमालय और आल्पस पर्वत के क्षेत्रों में लगभग समानांतर परिस्थितियां हैं, लेकिन आल्पस में बसे क्षेत्रों में नियोजित विकास से आपदा से नुकसान कम हुए हैं, जबकि हिमालय में अनियोजित विकास का परिणाम सबने देखा है।
प्रो. वल्दिया ने लांग व्यू स्थित निजी आवास में हुई विशेष भेंट में कहा कि आल्पस पर्वत क्षेत्र में बसे इटली, फ्रांस, आस्ट्रिया, जापान में नियोजित विकास हुए हैं, पर इसके उलट हिमालय की भावनाओं को न समझने की भूल हुई है। बृहद हिमालय के दक्षिणी ढाल की तलहटी पर 4 बड़े झुके हुए (लगभग 2 से ढाई हजार किमी) लंबे थ्रस्ट (दरारें) हैं, जो लगातार सक्रिय हैं। इनमें बार-बार संचलन होता है। बड़े थ्रस्ट के पास कई छोटी दरारें भी मौजूद हैं। जिसके कारण भूस्खलन होता है।
बीते 7-8 वर्षों से हिमालय के वनाच्छादित क्षेत्रों में अल्पकालीन अतिवृष्टि हो रही है। बीते वर्षों में भागीरथी, अलकनंदा, कोसी में आपदा आई। इस वर्ष केदारनाथ, बद्रीनाथ, धारचूला में अल्पकालीन अतिवृष्टि से कई स्थानों पर नुकसान हुआ। कहा कि पुरानी सभी सभ्यताएं नदियों के काफी ऊपर बसीं थी। लेकिन अत्याधुनिक तकनीकी युग में नदियों के फ्लड वे में रिसोर्ट्, इंस्टीट्यूट बना दिए गए हैं। धीमी नदियों ने समय चक्र के अनुरूप अपना स्वरूप बदला तो तभी ऐसी तबाही हुई। अब भी अलकनंदा, भागीरथी नदियों में 95 प्रोजेक्ट चल रहे हैं। उन्होंने क्षेत्र के नियोजित विकास के लिए भू-वैज्ञानिक, वन वैैज्ञानिक समेत विभिन्न विषय विशेषज्ञों की स्वतंत्र एजेंसी से रायशुमारी कर रिपोर्ट लेने की वकालत की।