जलवायु परिवर्तन, पर्यटन दबाव, अत्यधिक चराई, आवास विखंडन और अवैध संग्रहण के चलते इंदर किला राष्ट्रीय उद्यान उत्तर-पश्चिमी हिमालय में मौजूद 552 पौधों में से छह प्रजातियां अत्यंत संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच चुकी है। यहीं नहीं 24 संकटग्रस्त व 42 संवेदनशील श्रेणियों में हैं। कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधार्थी के शोध में इस बात का खुलासा हुआ है।
कुल्लू जिले के इंदर किला राष्ट्रीय उद्यान पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधार्थी सुनील दत्त ने शोध कार्य पूरा किया है। वर्ष 2017 से वर्तमान तक अध्ययन में कुल 552 पौधों की प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया। इसमें पाया कि इनमें 49 फीसदी प्रजातियां औषधीय हैं जिनमें जड़ें, पत्तियां और कंद स्थानीय समुदायों की परंपरागत उपचार पद्धतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि औषधीय पौधों की उपलब्धता में भी गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि कई समुदाय अब भी इनका उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि संरक्षण, समुदाय आधारित निगरानी, औषधीय पौधों के सतत उपयोग मॉडल, प्रजाति-विशिष्ट संरक्षण योजना जैसे उपाय इस अत्यंत संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र के स्थायी प्रबंधन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
यह हैं संकटग्रस्त
अध्ययन में दर्ज की गई प्रजातियों में से छह प्रजातियां अत्यंत संकटग्रस्त, 24 संकटग्रस्त तथा 42 संवेदनशील श्रेणी में पाई गईं। इनमें हाइमेनिडियम डेंसिफ़्लोरम, सॉस्यूरिया गॉसिपिफ़ोरा, फ्रिटिलारिया सिरोसा, डैक्टिलोरिज़ा हेटागिरिया, एंजेलिका ग्लौका, सॉस्यूरिया ओब्वालाटा, पोडोफाइलम हेक्सांद्रम, ट्रिलियम गोवनियानम और लिलियम पॉलीफाइलम जैसी महत्त्वपूर्ण उच्च हिमालयी औषधीय प्रजातियां शामिल हैं।
17 घरेलू उपयोगों के लिए होती हैं प्रयुक्त
शोध में पाया गया कि 70 प्रजातियां चारे, 73 खाद्य, 36 पवित्र व धार्मिक, 20 शोभाकार, 15 रंग, 11 ईंधन तथा 17 विभिन्न घरेलू उपयोगों के लिए प्रयुक्त होती हैं। 32 प्रजातियों का उपयोग स्थानीय पशु-चिकित्सा में होता है जबकि 20 प्रजातियां वेक्टर-जनित रोगों के पारंपरिक उपचार में उपयोग की जाती हैं। इसके अतिरिक्त 15 प्रजातियां बौद्ध एवं खंपा समुदायों की पारंपरिक अनुष्ठानों में महत्वपूर्ण पाई गईं और 11 प्रजातियां सुगंध एवं धूप निर्माण में प्रयुक्त होती हैं।
यह हैं मुख्य कारण
- शत फीसदी उत्तरदाताओं ने मौसम में अस्थिरता।
- 98 फीसदी वर्षा में कमी।
- 94 फीसदी हिमपात घटना
- 89 फीसदी गर्मी बढ़ना।
- करीब 93 फीसदी शीतकाल छोटा होना
- 97 फीसदी वर्षा वाले दिनों की संख्या कम होना।
- 63 फीसदी ओलावृष्टि की आवृत्ति बढ़ना।