हल्द्वानी। चिपको आंदोलन को आज 45 साल हो गए हैं। 1973 में गौरा देवी के नेतृत्व में पेड़ कटने से बचाने के लिए महिलाएं पेड़ों पर चिपक गईं थीं। इसके माध्यम से उन्होंने वनों पर अपना परंपरागत अधिकार जताया। इस आंदोलन को व्यापक रूप पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा और चंडीप्रसाद भट्ट ने दिया। आंदोलन की 45वीं वर्षगांठ पर गूगल ने चिपको आंदोलन को अपना डूडल समर्पित किया है।
आंदोलन तत्कालीन उत्तरप्रदेश, वर्तमान में उत्तराखंड के चमोली जिले में सन 1973 में शुरू हुआ। चिपको आंदोलन एक पर्यावरण रक्षा का आंदोलन था। तब वन विभाग के ठेकेदारों ने वनों को काटने का प्रयास किया तो ग्रामीणों ने इसका विरोध किया। कुछ ही वर्षों में इस आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया। इसमें महिलाओं की संख्या अधिक थी। तब नारा प्रचलित हुआ कि ‘क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।’ ‘मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार।’ इस आंदोलन की मुख्य उपलब्धि रही कि इसने केंद्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक सघन मुद्दा बना दिया था। इस आंदोलन को वर्ष 1987 में सम्यक जीविका पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस आंदोलन का ही असर था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी। बाद के वर्षों में यह आंदोलन बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और विंध्याचल तक फैला गया था। पश्चिमी घाट और विंध्य पर्वतमाला में भी वृक्षों की कटाई पर रोक लगी। लोगों की आवश्यकताओं, पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाव बनाने में भी आंदोलन सफल रहा। चिपको के सहभागी और कुमाऊं के पद्मश्री प्रो. डॉ. शेखर पाठक के मुताबिक भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और यहां तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही संभव हो पाया। यह अनोखी पहल विश्वभर में प्रख्यात हुई।