सरकार शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए भले ही लाख दावे करे, लेकिन हकीकत इसके उलट है। कुमाऊं मंडल की प्रारंभिक शिक्षा को ही लें, हालात हैं कि 147 स्कूलों में कोई विद्यार्थी पढ़ने ही नहीं आ रहा है।
जिसकी वजह से उन्हें बंद करना विभाग की मजबूरी हो गई है। दूसरी ओर 712 स्कूल ऐसे हैं जो एक शिक्षक के सहारे जैसे-तैसे चल रहे हैं। ऐसे में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चों की नींव कैसे मजबूत होगी इसका अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।
शिक्षा महकमे में शिक्षकों की कमी आम बात है। हर माह शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए चाहे वह ग्रामीण क्षेत्रों में हो या शहरी क्षेत्रों में धरना प्रदर्शन होते रहते हैं लेकिन इसके बाद भी कुछ भी हल नहीं निकल पाता है।
आखिरकार उसका खामियाजा बच्चों को ही भुगतना पड़ता है। प्राथमिक स्तर पर बुनियादी शिक्षा की बेहद खराब होती हालत से अब स्कूली बच्चों का रुझान तेजी से पब्लिक स्कूलों की ओर बढ़ रहा है और प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की संख्या घटती ही जा रही है।
विभागीय आंकड़ों पर नजर डालें तो अल्मोड़ा जिले में सर्वाधिक 285 स्कूल एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। इसके अलावा बागेश्वर में 193, चंपावत में 36, नैनीताल में 144, पिथौरागढ़ में 35 व ऊधमसिंह नगर जिले में 19 स्कूलों की हालत ऐसी ही है।
दूसरी ओर शून्य छात्र संख्या होने की वजह से पिथौरागढ़ जिले के 50, नैनीताल के 13, चंपावत के 10, बागेश्वर के 15 जबकि सर्वाधिक अल्मोड़ा जिले के 59 स्कूल बंद हो गए हैं।
बता दें वर्तमान में अल्मोड़ा में 516, बागेश्वर में 594, चंपावत में 1459, नैनीताल में 1183, पिथौरागढ़ में 790 तथा ऊधमसिंह नगर में 979 प्राथमिक स्कूल हैं।
बीते माह जब महानिदेशक शिक्षा डी. सैंथिल पांडियन नैनीताल आए थे उस दौरान भी उन्होंने स्वीकार किया था कि सूबे में करीब 350 स्कूलों में छात्र संख्या शून्य है। उनका कहना था कि आरटीई के तहत एक किमी की परिधि में प्राथमिक स्कूल खोलने से यह स्थिति हुई है। ऐसे स्कूलों का सर्वे कराया जाएगा।