हल्द्वानी। जंगल के जल स्रोतों के संरक्षण पर काम शुरू हुआ है। वन विभाग ने संयुक्त राष्ट्र विकास परियोजना (यूएनडीपी) के सहयोग से भी जल स्रोतों को बचाने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। इसके अलावा बारिश का जल भी बेकार न जाए, उसको भी जंगल में संरक्षित करने की योजना बनाई है।
उत्तराखंड के जल स्रोतों की स्थिति बेहतर नहीं है, इसे लेकर विशेषज्ञ कई बार चिंता जाहिर कर चुके हैं। वन मुख्यालय ने जल स्रोतों के संरक्षण के लिए योजना पर काम शुरू किया है। तीन निजी संस्था एक्वाडैम, पीएसआई और चिराग के माध्यम से राज्य के जंगलों में स्थित 68 जल स्रोतों का हाल में सर्वे कराया था। इसमें में एक मिनट में एक लीटर पानी से लेकर एक मिनट में ही 50 लीटर तक पानी का प्रवाह वाले जल स्रोत रिपोर्ट हुए हैं।
इस योजना से जुड़े और एक्वाडैम संस्था के सिद्धार्थ पाटिल के अनुसार संरक्षण कार्य शुरू करने से पहले जल स्रोत कहां से निकल रहा है, उस जगह पर पत्थर की बनावट, जल स्रोत का आकार और तीसरा पानी की गुणवत्ता के संबंध में जानकारी जुटाई है। जल स्रोत पहाड़ों के दरारों से निकलते हैं और हर जगह की पत्थर की बनावट अलग-अलग होती है। ऐसे में सर्वे के दौरान पत्थरों को समझने का प्रयास किया गया है और उसके आधार पर संरक्षण की योजना को अंतिम रूप दिया गया है।
वेजीटेटिव ट्रीटमेंट से लेकर चैक डैम तक
जल स्रोतों को बचाने के लिये वेजीटेटिव ट्रीटमेंट (वनस्पतियों को लगाना) से लेकर चैक डैम, चाल- खाल योजना जैसे पुराने ही माध्यमों का सहारा लिया जाएगा। इस योजना में यूएनडीपी के अलावा कैंपा और जायका परियोजना के माध्यम से काम होगा।
इन प्रभागों में स्थित हैं जल स्रोत
यह जल स्रोत नैनीताल, बागेश्वर, तराई पूर्वी, रामनगर, पिथौरागढ़, रानीखेत, टिहरी, पौड़ी, चकराता, नरेंद्र नगर, रुद्रप्रयाग के अलावा लैंसडाउन, कालसी स्वॉयल कंजरवेशन प्रभाग के जंगलों में स्थित है।
जल स्रोतों के संरक्षण के लिए कार्य शुरू किया गया है। इसमें यूएनडीपी समेत निजी संस्थाओं की मदद ली गई है। प्रयास किया गया कि योजना के लिए वित्तीय भार राज्य सरकार पर न पड़े। अन्य परियोजनाओं से बजट जुटाया जाएगा। -जयराज, प्रमुख वन संरक्षक
जिन प्रभागों में जायका परियोजना लागू हैं, वहां पर जायका से बजट उपलब्ध कराया जाएगा। बाकी जगह कैंपा और वन विभाग के बजट से योजना के लिए धनराशि दी जाएगी।
-अनूप मलिक, अपर मुख्य वन संरक्षक व जायका परियोजना निदेशक