हल्द्वानी। नवंबर के दूसरे शनिवार और रविवार को हल्द्वानी में मनाया जाने वाला जोहार महोत्सव इस बार एमबी इंटर कॉलेज मैदान में आयोजित होगा। जोहार सांस्कृतिक एवं वेलफेयर सोसायटी द्वारा आयोजित यह सांस्कृतिक समारोह हल्द्वानी में खास पहचान रखता है।
आयोजक संस्था के लोग मूल रूप से मध्य हिमालय में तिब्बत से लगे गोरी गंगा की घाटी मल्ला जोहार में स्थित 14 गांवों के निवासी हैं, जो शौका नाम से जाने जाते हैं। तिब्बत व्यापार और उसके संचालन और मल्ला जोहार में 3060 से 3412 मीटर की ऊंचाई में बसे इन गांवों में शीतकालीन आवास संभव नहीं होने से जाड़ों में मुनस्यारी और तल्ला जोहार के गांवों में आने वाले शौका एक विशिष्ट संस्कृति के पोषक और संवाहक रहे हैं। उनके निवास की भौगोलिक संरचना, तिब्बत व्यापार, ऊन का घरेलू उद्योग के साथ ही उनका इतिहास, भाषा और समृद्ध लोक परंपरा इस विशिष्ट समाज और संस्कृति का पोषक रहा है।
जोहार सांस्कृतिक एंड वेलफेयर सोसायटी के गजेंद्र सिंह पांगती बताते हैं कि हल्दुवा, पिंगलुवा पूर्वजों के कारण इस समाज की मुखाकृति में मंगोलियन प्रभाव है। लेकिन वे वैदिक धर्म के अनुयायी हैं। बोली हिंदी और कुमाऊंनी की एक उपभाषा है। पहनावा भी कुमाऊंनी और गढ़वाली परिधानों का सम्मिश्रण है।
समृद्ध लोक परंपरा को बचाने का संकल्प
हल्द्वानी।1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत व्यापार बंद हो गया और शौकाओं ने मल्ला जोहार के गांवों को छोड़कर मुनस्यारी और तल्ला जोहार में स्थायी रूप से निवास करना शुरू कर दिया। रोजी-रोटी का साधन, तिब्बत व्यापार समाप्त होने के बाद आज इस समाज के युवा अपने व्यवसाय से देश और विदेश के विभिन्न स्थानों में सफलता के नित नए आयाम लिख रहे हैं लेकिन उनकी भाषा और समृद्ध लोक परंपरा विलुप्त की कगार पर है। इसी संस्कृति को संरक्षित करने की लगी है जोहार सांस्कृतिक एवं वेलफेयर सोसायटी।
जोहार महोत्सव में होंगी सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम