उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने सैनिक और पूर्व सैनिक परिवारों पर फोकस बढ़ा दिया है। हल्द्वानी में पांच हजार से अधिक पूर्व सैनिकों के गौरव सेनानी मिलन समारोह में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी को इसी रणनीति की कड़ी माना जा रहा है। राज्य में सैनिक और पूर्व सैनिकों की संख्या करीब 3.3 प्रतिशत बताई जाती है जबकि परिवार और रिश्तेदारी के व्यापक प्रभाव के चलते यह वोट बैंक 12 से 13 फीसदी तक बढ़ जाता है।
भाजपा इस वर्ग के बीच वन रैंक-वन पेंशन, सैनिक सम्मान और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रमुख मुद्दा बना रही है। नितिन नवीन ने कांग्रेस के पुराने शासनकाल की सीमा सड़कों और सैनिक सुविधाओं की स्थिति की तुलना मौजूदा सरकार के रक्षा बजट, निर्यात और सीमा ढांचे से की। कश्मीर से चीन सीमा तक का जिक्र कर उन्होंने भाजपा सरकार को मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा के नैरेटिव से जोड़ा। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उस सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है जिसका प्रभाव पहाड़ से लेकर मैदानी सीटों तक माना जाता है।
ओआरओपी से अग्निवीर तक, मुद्दों की पूरी श्रृंखला
नवीन के भाषण में दो चुनावी नैरेटिव
हल्द्वानी के मंच से नितिन नवीन ने सैनिकों के मुद्दे को सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा के नैरेटिव से जोड़ दिया। उन्होंने 2011-12 के अरुणाचल दौरे का उदाहरण देते हुए सीमा क्षेत्रों में खराब सड़कों और सैनिकों की कठिनाइयों का जिक्र किया। इसके बाद उन्होंने भाजपा सरकार के दौर में सीमा सड़क ढांचे, रक्षा बजट और रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी को रखा। भाजपा पूर्व सैनिकों के बीच सिर्फ यह संदेश नहीं देना चाहती कि उसने सैनिकों के कल्याण के लिए काम किया बल्कि वह कमजोर सुरक्षा व्यवस्था से मजबूत सैन्य क्षमता तक का व्यापक राजनीतिक आख्यान भी स्थापित करना चाहती है।
कश्मीर का लाल चौक भी इसी रणनीति का हिस्सा रहा। भाजपा युवा मोर्चा के महामंत्री रहते हुए प्रेसवार्ता के लिए वह कश्मीर के लाल चौक पहुंचे तो वहां पाकिस्तानी झंडा लहराता देख शर्म से सिर झुक गया। भाजपा की सरकार आने के बाद उसी लाल चौक पर तिरंगा लहराने लगा है। पाकिस्तानी झंडे से तिरंगे तक के प्रतीकात्मक बदलाव का उल्लेख कर नवीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सीधे भाजपा सरकार की उपलब्धियों से जोड़ा।
सैनिक कार्ड का बड़ा अर्थ
गणेश जोशी का ‘लांसनायक’ वाला संदेश
सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी का खुद को मंत्री के बजाय ‘लांसनायक’ के रूप में पूर्व सैनिकों के बीच पेश करना भी राजनीतिक संदेश से कम नहीं है। इससे सरकार और पूर्व सैनिक समुदाय के बीच भावनात्मक जुड़ाव बनाने की कोशिश साफ दिखाई देती है। उनका यह कहना कि हल्द्वानी से उठी आवाज दिल्ली तक पहुंचनी चाहिए और 2027 में फिर भाजपा की सरकार बनानी है, समारोह को सीधे चुनावी लक्ष्य से जोड़ देता है। सैनिक सम्मान और राजनीतिक अपील के बीच की दूरी यहां लगभग खत्म हो जाती है।