हल्द्वानी। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) प्रीतू शर्मा की अदालत ने गैंगरेप के मामले में मुख्य अभियुक्त को 20 साल और उसके साथी को चार साल की सजा सुनाई है। दोनों अभियुक्तों पर अदालत ने दस-दस हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। दो अन्य नाबालिग अभियुक्तों के मामले में अदालत अगले दिन सुनवाई करेगी। दो अन्य अभियुक्त संदेह के आधार पर छोड़ दिए गए।
विशेष लोक अभियोजक नरेंद्र सिंह नेगी के अनुसार बनभूलपुरा थाने में नाबालिग लड़की के पिता ने 25 मई 16 को मुकदमा दर्ज कराया कि उसकी बेटी के साथ आंवला गेट चौकी के समीप जंगल में गैंगरेप किया गया। इस मामले में पुलिस ने छह लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। बताया गया कि अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा मौनी गांव निवासी दीपक उर्फ दीपू नाबालिग लड़की का दोस्त था। दीपक लड़की को बहाने से बुलाकर आंवला गेट चौकी के सामने जंगल में ले गया। इसके बाद दोस्तों को फोन कर बुलाया। दोस्तों ने लड़की के साथ गैंगरेप कर वीडियो क्लिप तैयार की। इस मामले में उपनिरीक्षक राजेंद्र कुमार पुलिस ने अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा मौनी गांव निवासी दीपक उर्फ दीपू, आंवलागेट निवासी महेश उर्फ मैसू उर्फ मल्केश, चौधरी कॉलोनी निवासी गोलू उर्फ रजत, आंवला गेट निवासी मुकेश कुमार उर्फ महेंद्र सिंह के साथ दो नाबालिगों को गिरफ्तार किया। उपनिरीक्षक सुमन पंत ने पीड़िता का बयान लेने के बाद ब्लड सहित अन्य साक्ष्यों को जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा। इनमें महेश उर्फ मैसी का डीएनए लड़की से मिलान कर गया। पीड़िता ने पहले अभियुक्तों के खिलाफ कलमबंद बयान दिया था लेकिन बाद में पीड़िता अपने बयान से मुकर गई अर्थात पक्षद्रोही हो गई। अभियोजन पक्ष ने साक्ष्यों के समर्थन में दस गवाहों को पेश किया। इस मामले में अदालत ने डीएनए को आधार मानते हुए अभियुक्त दीपक और महेश उर्फ मैसी को दोषी पाया। अदालत ने 376 डी, पॉक्सो सहित अन्य धाराओं के तहत दोषी महेश उर्फ मैसी को 20 साल के कारावास के साथ दस हजार रुपये अर्थदंड लगाया है। दो अन्य अभियुक्तों गोलू उर्फ रजत और मुकेश कुमार को संदेह के आधार पर अदालत ने छोड़ दिया। दोनों की क्लीपिंग स्पष्ट नहीं थी। इधर दो नाबालिगों के मामले में अदालत अगले दिन विचारण करेगी।
पक्षद्रोही पर भारी पड़ा डीएनए
अभियोजन पक्ष के अनुसार अदालत को पीड़िता का कलमबंद बयान और बलात्कार होने के प्रमाण डीएनए से पहले ही मिल गए थे। किसी कारण के चलते पीड़िता ने बयान बदला लेकिन डीएनए का अकाट्य साक्ष्य बदला नहीं जा सकता है। इसी कारण अदालत ने डीएनए के साक्ष्य और गवाहों के बयान के आधार पर सजा का निर्धारण किया।