नैब में रह रहे बच्चों के जीवन में उजियारा लाने के लिए एक टीम काम कर रही है। खुद की चिंता छोड़कर इस टीम के सदस्य खास बच्चों के भविष्य को स्वर्णिम बनाने में जुटे हैं। उनका एकमात्र मिशन है कि ये बच्चे समाज की मुख्य धारा में शामिल होकर अपना मुकाम बना सकें। गौला पार में आवासीय परिसर में रह रहे शिक्षकों और कर्मचारियों से बात की अभिजात कांडपाल और दीपिका नेगी ने
हेमराज सिंह बोरा
दिव्यांगों को संगीत सिखाने वाले शिक्षक हेमराज सिंह बोरा की जन्म से ही आंखों में रोशनी नहीं है। खेतीखान चंपावत के रहने वाले हेमराज दो सालों से बच्चों को संगीत सिखा रहे हैं। हेमराज की प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ स्थित ब्लाइंड स्कूल से हुई और उन्होंने चित्रकूट के कॉलेज से संगीत में एमए किया। सहारनपुर के ब्लाइंड स्कूल में कुछ साल पढ़ाने के बाद दो साल पहले एक परिचित प्रधानाचार्य की मदद से नैब के संपर्क में आ गए। हेमराज कहते हैं कि नैब में रहने वाले बच्चे बहुत जल्दी संगीत सीख लेते हैं। कहते हैं कि संस्था से मिलने वाली तनख्वाह से वह परिवार को सहयोग करते हैं।
देवकी अम्मा
बच्चे 74 वर्षीय देवकी देवी को अम्मा कहते हैं। देवकी यहां नौ साल से रह रही हैं। वह बताती हैं कि जब पहली बार यहां आईं थीं तब केवल सात बच्चे ही थे। बच्चों के अलावा बड़े भी उन्हें अम्मा नाम से ही संबोधित करते हैं। वार्डन मीना बताती हैं कि अम्मा सुबह तीन बजे उठती हैं और उसके बाद बच्चों को जगा कर स्कूल के लिए तैयार करवाती हैं। अम्मा कहती हैं कि अब यही उनका परिवार है, तीन साल से वह अपने गांव नहीं गईं।
दीपा पांडे
ऊंचापुल निवासी पांडेय 2005 से नैब के आवासीय परिसर में रह रहे बच्चों को पढ़ा रहीं हैं। 2005 से पहले एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ा चुकीं पांडे ने उसी दौरान उन्होंने ब्रेल भी सीखी। उन्होंने बताया कि वे इग्नू से विशेष बीएड कर चुकी हैं। कहतीं हैं कि शुरुआत में बच्चों को पढ़ाने में थोड़ी दिक्कत हुईए लेकिन अब आसानी से बच्चे समझ जाते हैं।
काजल बिष्ट
अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले नैब के बच्चों को दो वर्षों से पढ़ा रहीं बिष्ट का कहना है कि वह बच्चों से काफी कुछ सीखतीं हैं। दो नहरिया निवासी बिष्ट ने बताया कि बच्चों में सीखने की काफी ललक है। दृष्टिबाधित होने के बावजूद बच्चे त्वरित जवाब देते हैं।
कृष्ण चंद्र जोशी
कुसुमखेड़ा निवासी जोशी एक साल से नैब के बच्चों को गणित पढ़ा रहे हैं। गणित वर्ग से बीएससी जोशी का कहना है कि दृष्टि बाधित दिव्यांगों के लिए गणित चुनौतीपूर्ण विषय है। उन्होंने कहा कि अगर दृष्टिबाधित दिव्यांगों के लिए गणित और भौतिकी का अलग पाठ्यक्त्रस्म बन जाए तो वह बहुत उपयोगी साबित होगा।
प्रेमा कार्की
गौलापार निवासी प्रेमा कार्की सात साल से बच्चों को संस्कृत और सामाजिक विज्ञान पढ़ा रही हैं। इससे पहले वह कई विद्यालयों में शिक्षिका रहीं थीं। बताती हैं कि पहले बच्चों को पढ़ाने में दिक्कत होती थी, लेकिन अब वह बच्चों से सीखती हैं।
मीना सिंह
लालकुआं निवासी मीना सिंह एक साल से यहां वार्डन के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्होंने लखनऊ विवि से अंग्रेजी में एमए किया था। पति मर्चेंट नेवी में हैं, इसलिए वह ज्यादातर बाहर ही रहते हैं। घर पर खाली रहती थीं इसलिए नैब से जुड़ गईं।
कांता विनायक
2005 से नैब से जुड़ीं कांता विनायक बच्चों को योगाभ्यास करातीं हैं। सिविल लाइंस भोटिया पड़ाव निवासी विनायक बताती हैं बच्चे आसानी से अनुलोम-विलोम, सूर्य नमस्कार, कपालभाति आदि कर लेते हैं।
ज्योति नौला
गौलापार निवासी ज्योती नौला ने पंतनगर विवि से ह्यूमन डेवलपमेंट एंड फेमिली पाठ्यक्रम से स्नातक और गुजरात से इसमें स्नातकोत्तर किया है। वह पिछले एक साल से नैब में काउंसलर के रूप में कार्य कर रही हैं। 2013 में यहां इंटर्नशिप करने आईं थीं तब से यहां काम करने के लिए प्रेरणा मिली।
भावना पांडे
पिथौरागढ़ निवासी पांच साल से यहां भोजन माता हैं। 14 महीने का बेटा था, जब पति की मौत हो गई थी। तब से यहां भोजन माता का काम करती हैं। सबको उनके हाथ का खाना बेहद पसंद है। बताती हैं कि नवरात्रों में सबके लिए विशेष खाना बनाया जाता है।
तीन संवासिनी भी काम में बंटाती हैं हाथ
नारी निकेतन हल्द्वानी से आई तीन संवासिनी ममता, रानी और पार्वती को भी यहां रहते एक साल पूरा हो गया है। ममता और रानी बोल सुन नहीं सकते जबकि पार्वती सुन तो सकती है, लेकिन साफ नहीं बोल पाती। तीनों बच्चों और नैब की साफ सफाई का ध्यान रखती हैं। साथ ही रसोई में भी हाथ बंटाती हैं। तीनों ही का व्यवहार बच्चों के प्रति विनम्र है।