रानीखेत (अल्मोड़ा)। उपमंडल क्षेत्र में वन्य जीवों और लावारिस पशुओं के बढ़ते आतंक ने किसानों को खेतीबाड़ी से विमुख कर दिया है। इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बन पाने के कारण साधनहीन बेबस किसान कई स्थानों पर खेती छोड़ आजीविका के लिए मजदूरी के पेशे को अधिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कभी परंपरागत अनाज, फल, सब्जियों के रूप में सोना उगलने वाले खेत आज बंजर भूमि में तब्दील हो रहे हैं। किसान सुअररोधी दीवारों को भी समस्या का ठोस निराकरण नहीं मानते।
ग्रामीण इलाकों में जंगली सुअर, चीतल, सांभर, बंदरों के बाद रही सही कसर लावारिस जानवर पूरी कर रहे हैं। उपमंडल क्षेत्र के अंतर्गत ताड़ीखेत, भतरौंजखान, भिकियासैंण, सल्ट, द्वाराहाट आदि कई क्षेत्रों में आलू का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता था। अन्य सब्जियां भी उगाई जाती थीं, फलों का भी अच्छा उत्पादन होता था। सिंचाई वाले खेतों में धान, मडुवा, गेहूं, दलहनी जैसी परंपरागत फसलों का उत्पादन होता है, लेकिन जंगली सुअर, बंदरों ने सब कुछ तबाह कर दिया है, जिस कारण ग्रामीण खेत बंजर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। साल भर मेहनत करने के बाद किसानों के हाथ मायूसी के अलावा कुछ भी नहीं आता। द्वाराहाट क्षेत्र में लावारिस जानवरों की समस्याओं को लेकर महिला एकता परिषद के नेतृत्व में कई बार वृहद आंदोलन तक हो चुके हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है।
ग्रामीण खेती छोड़ आजीविका के लिए मजदूरी करने को हो रहे विवश
रानीखेत उपमंडल में सब्जी उत्पादक बेल्टों में सबसे अधिक कहर
आश्वासनों तक सीमित रह गई चकबंदी योजना
रानीखेत। चकबंदी को लेकर सरकारों के आश्वासन पूरे नहीं हो सके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को एकमुश्त जोत उपलब्ध कराकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की बातें तो होती रहती हैं, लेकिन योजना परवान नहीं चढ़ सकी हैं। क्षेत्र में चकबंदी लागू करने की मांग को लेकर आए दिन प्रदर्शन इस बात की तस्दीक करते हैं।
गगास घाटी में हरी सब्जियों के अलावा तमाम फलों का भी उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता है, लेकिन वन्यजीवों, लावारिस पशुुओं ने किसानों की नाक में दम कर दिया है। सरकार को इनकी रोकथाम के लिए ठोस नीति बनानी चाहिए। दुश्वारियों के बीच कैसे किसानों की आय दोगुनी होगी, यह समझ से परे है। किसानों को फार्मिंग लाइसेंस उपलब्ध किए जाने चाहिए।
- राजेंद्र सिंह बिष्ट, किसान, गगास घाटी।
-वन्यजीवों, लावारिस जानवरों की समस्या के निस्तारण की फिक्र किसी भी नुमाइंदे को नहीं है। खेतों को बचाने के लिए रात्रि में जगराता करना पड़ रहा है। बंदरों, सुअरों के अलावा क्षेत्र में बाहर से लेकर छोड़े जा रहे पशुओं ने और अधिक दुश्वारियां बढ़ा दी हैं। चकबंदी आदि योजनाएं भी सिर्फ कागजों में धूल फांक रही हैं।
- भूपाल सिंह, किसान बिजेपुर