हल्द्वानी। राजकीय मेडिकल कॉलेज का तमगा भले ही मेडिकल कॉलेज का हो मगर सुविधाएं पीएचसी जैसी हैं। टोटाम हादसे के घायलों के आने पर वास्तविक स्थिति खुलकर सामने आ गई। एसटीएच में न तो सीटी स्कैन मशीन काम रही थी और न ही न्यूरो सर्जन है। साढ़े पांच सौ बेड का अस्पताल होने के बावजूद प्रशासन को गंभीर घायलों के इलाज के लिए 50 बेड के निजी नीलकंठ हास्पिटल का सहारा लेना पड़ा।
स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए कांग्रेस और भाजपा की सरकारें आज से नहीं काफी लंबे समय से बड़ी-बड़ी बातें करती रही हैं। दोनों ही पार्टियों की केंद्र एवं राज्य में सरकार होने के बावजूद एसटीएच के दिन नहीं बहुरे। कुमाऊं के सबसे बड़े अस्पताल में न तो हृदय रोग विशेषज्ञ है और न ही कैथ लैब। मेडिकल कॉलेज में न्यूरो फिजीशियन और न्यूरो सर्जन तक नहीं है। टोटाम दुर्घटना के घायल जब एसटीएच पहुंचना शुरू हुए तो सिर के चोटें देखकर सभी डॉक्टरों के हाथ पैर फूल गए। एसटीएच में सीटी स्कैन मशीन खराब पड़ी थी और न्यूरो सर्जन है नहीं। ऐसे में मौके पर मौजूद एसडीएम अब्ज प्रसाद बाजपेयी ने सीटी स्कैन कराने के लिए आनन-फानन में बेस अस्पताल से संपर्क किया। बाजपेयी ने मरीजों की गंभीर हालत को देखते हुए नीलकंठ हास्पिटल से संपर्क साधकर गंभीर मरीजों को भिजवाया। कांग्रेस और भाजपा के मुंह पर यह करारा तमाचा है कि इतने बड़े अस्पताल में आवश्यकता के समय पर पूरी मदद घायलों को नहीं मिल पाई और 50 बेड के निजी नीलकंठ हास्पिटल का सहारा लेना पड़ा।
न सीटी स्कैन मशीन काम कर रही थी और न ही न्यूरो सर्जन है
सफेद हाथी बन गया है 550 बेड का अस्पताल, मरीजों को 50 बेड के निजी अस्पताल में ले जाना पड़ा
सीटी स्कैन मशीन रविवार की देर रात खराब हो गई थी। मशीन लगभग 12 वर्ष पुरानी हो चुकी है और नए के लिए जल्द ही प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा। न्यूरो सर्जन का पद मेडिकल कॉलेज में सृजित नहीं है। इसके लिए कई बार शासन को लिखा जा चुका है।
डॉ. सीपी भैसोड़ा प्राचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज