हल्द्वानी/भवाली। पहाड़ में चैत्र संक्रांति को मनाए जाने वाले फूल देई त्योहार की धूम अब बॉलीवुड तक पहुंच गई है। पिछले साल आई ‘ट्यूबलाइट’ फिल्म ने इस त्योहार को विश्व पटल तक पहुंचाया है। इस फिल्म में अल्मोड़ा जिले के चित्रेश्वर निवासी गायक कलाकार देव नेगी ने ‘छम्मादेई, छम्मादेई जतुक दिला सई’ गीत गाया है।
ज्योतिषियों के मुताबिक यह पर्व पर्वतीय परंपरा में बेटियों की पूजा, समृद्धि का प्रतीक होने के साथ ही रोग निवारक औषधि संरक्षण के दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। ज्योतिषाचार्य डॉ. जगदीश चंद्र भट्ट ने बताया कि कन्याएं और विवाहित बेटी पिता के घर आकर नवान्न, नवकुसुमों से पिता के घर की देहरी (देली) का पूजन करती हैं। परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं। पिता भी मिष्ठान, धन, उपहार आदि देता है।
यह पर्व नई फसल, नव ऋतु के स्वागत का भी पर्व है। प्रकृति के नूतन शृंगार का अभिनंदन करते हुए प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं से घर की देहरी (देली) का कन्याओं द्वारा किया जाने वाला पूजन इसका प्रतीक है। वह कामना करती हैं कि जैसे प्रकृति ने अन्न, पुष्प, बौर, मौसम आदि द्वारा अपना चतुुर्दिक शृंगार किया है। वहीं पुरुषार्थ, चतुष्दय मेरे पिता के घर आए।
शंकराचार्य ने भी किया है उल्लेख
डॉ. भट्ट बताते हैं कि शंकराचार्य ने भी फूलदेई त्योहार का वर्णन अपने स्त्रोत्र ‘आनंद लहरी’ में किया है। चैत्र संक्रांति, वसंत ऋतु के आगमन पर पार्वती चारों ओर खिले पुष्पों, तालाब में खिले कमलों को तोड़कर अपनी सखियों के साथ आनंदित होकर अपने पिता हिमालय की हित कामना से उनके भवन के द्वार का पूजन करती हैं। यानी यह पर्व 1200 साल पहले भी ऋतु पूजन, पिता की समृद्धि के लिए बोटियों द्वारा प्रसन्नता से मनाया जाता था।
बच्चों में रहता है उत्साह
बच्चे एक दिन पहले ही जंगल से बुरांश, प्योली, बासिंग जंगली फूलों के अलावा आडू, खुबानी, पूलम के फूलों को चुनकर लाते है। उन फूलों के साथ चावल, गुड़, हरे-पत्ते, नारियल को एक थाली या रिंगाल की टोकरी में रखकर घर-घर जाकर फूल-दई, छम्मा-दई, देणी-द्वार, ये देहली स बारम्बार नमस्क के गाने गाते है। बदले में वे रुपये, चावल-गुड़ आदि पाते हैं।
त्योहारों का तय समय और उसके मनाने का ढंग अपने आप में खास है। ऋतुओं के बदलने के साथ ही त्योहारों का आना और उसका भी विशेष महत्व है। फूलदई त्योहार इसी का प्रतीक है।
-पद्मश्री डॉ यशोधर मठपाल, प्रसिद्ध पुरातत्वविद