खटीमा। तीन पहले श्रम विभाग की टीम ने फार्म हाउस से 20 वर्ष से बंधुआ मजदूर बुआ का परिवार एवं छोटे फूफा के छूटते ही युवक गुलाब भी अपने को नहीं रोक पाया और हिम्मत कर मालिक की बाइक लेकर घर गौहर पटिया पिता के पास दौड़ पड़ा। फार्म मालिक ने बाइक उड़ाने का आरोप लगाते ही पुलिस ने उसके घर से पकड़ लिया। युवक फिर फार्म हाउस न भेजने की मिन्नत करते रहा।
मूल रूप से पकड़िया निवासी मोहन सिंह ने करीब 25 दिन पहले श्रम विभाग, डीएम आदि उच्चाधिकारियों को रजिस्ट्री से पत्र भेजकर बंधन मुक्त करने की गुहार लगाई थी। पत्र में पुरनापुर निवासी हरदेव सिंह के फार्म हाउस में परिवार के साथ कथित रूप से बंधक बनाकर रखने का आरोप लगाया था। आठ अगस्त को श्रम निरीक्षक एके पुरोहित ने टीम के साथ पुरनापुर स्थित फार्म हाउस से उसे उसकी पत्नी बसंती देवी, पुत्री 17 वर्षीय आरती, 15 वर्षीय नेहा, 13 वर्षीय पुत्र शक्ति और मोहन के अविवाहित भाई लल्लू को छुड़ाकर उनके घर भेजा।
मोहन परिवार के साथ बनबसा के चूना भट्टा स्थित अपने भाई जोगेंद्र सिंह राणा के घर रह रहा है। इधर, बुआ के परिवार के बंधन मुक्त होते ही शुक्रवार दोपहर गौहर पटिया निवासी 24 वर्षीय गुलाब सिंह भी अपने पिता बेेचे सिंह के पास मालिक की बाइक ले कर भाग आया। शनिवार को बाइक उड़ाने व 50 हजार रुपये ले जाने का आरोप लगते ही पुलिस भी पहुंच गई।
पुलिस आने पर गुलाब ने बताया कि उसकी मां की मौत वर्ष 2008 में हो चुकी है, उसके घर में सिर्फ पिता हैं। वह चार साल पहले वह बड़ी बुआ के यहां गया और वहीं पर बंधक बन गया। बताया कि वह फार्म हाउस में ही दिन रात काम करता था, उसे बस जेब खर्च व भोजन मिलता था।
बताया कि बुआ का परिवार मुक्त होते ही वह भी अपने को नहीं रोक पाया और शुक्रवार को मालिक की बाइक लेकर घर चला आया। बताया कि जब बुआ के परिवार को मुक्त कराया जा रहा था तब वह खेत में काम करने गया था। इधर, कोतवाली पुलिस योगेश चंद्र उपाध्याय ने बताया कि मामले की जांच की गई, जिसमें लेन-देन का मामला सामने आया। इस पर गुलाब को छोड़ दिया गया।
घुट-घुट कर आखिर कब तक जीते, हिम्मत की तो मिली आजादी
खटीमा। तब 18 साल का था और शादी होते ही पैसे की जरूरत पड़ी तो मजदूरी करने पकड़िया से पत्नी को लेकर पुरनापुर आ गया। इन 20 वर्षों में तीन लड़कियां, एक लड़का का भरा पूरा परिवार।
पहले तो पति-पत्नी ही फार्म में दिन रात काम करते थे, लेकिन अब चारों बच्चों से भी काम कराया जाने लगा। बीते दिनों हिम्मत जुटाकर डीएम और अधिकारियों को पत्र भेजा तो आज में परिवार आजादी की सांस ले पा रहा है।
20 वर्ष तक बंधुआ जीवन जीकर खुले में जी रहे मोहन अपनी दास्तां बताते-बताते अपने आंसू नहीं रोक पाया। उसने बताया कि छह भाईयों में वह व उसका छोटा भाई लल्लू व परिवार पुरनापुर में एक टिनशेड में मालिक के रहमोकरम पर जी रहा था। बताया कि दो वर्ष से उसको कागजों में चार हजार रुपये मासिक मजदूरी मिल रही थी, लेकिन वास्तविकता यह थी कि कभी पांच सौ तो कभी जेब खर्च, महीने में 50 किलो चावल या आटा ही मिलता था।
बड़ी बेटी ने तो भागकर शादी कर ली। दो जवान हो रही अनपढ़ बेटियों की फिक्र खाए जा रही थी। बच्चे भी फार्म हाउस में दिन रात काम करते थे। बनबसा के चूना भट्टा में अपने भाई के परिवार को अपने बीच पाकर जोगेंद्र के परिवार में जैसे खुशी लौट आई। जोगेंद्र ने बताया कि वह भी मजदूरी करता है और भाई का परिवार भी जैसे-तैसे मजदूरी कर पेट भर लेंगे।