नैनीताल। हाईकोर्ट ने जेल मैनुअल में फांसी की सजा प्राप्त अभियुक्त को तन्हाई में रखे जाने के नियम को असंवैधानिक करार दिया है। ऐसे कैदियों को सामान्य कैदियों के साथ रखने का आदेश दिया है। अदालत ने 55 वर्षीय महिला की गैंगरेप के बाद हत्या के मामले में सुनवाई के बाद निचली अदालत की ओर से अभियुक्त सुशील और महताब को दी गई फांसी की सजा को बरकरार रखते हुए अपीलार्थी पर लगाए गए एससी-एसटी एक्ट को गलत मानते हुए उसे हटा दिया है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई वैज्ञानिक मानक तय नहीं है जिसके आधार पर फांसी की सजा पाए अपराधियों को तनहाई में रखा जाए। इससे उन्हें घोर शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है। कोर्ट ने इसे संविधान की धारा 20 व 21 का उल्लंघन माना। इसे नैलसन मंडेला नियमावली के भी विपरीत माना। कोर्ट ने अपने निर्णय में साफ कहा है कि ऐसे कैदियों के भी संवैधानिक अधिकार हैं। सजा के दो तीन दिन तक ही उनको अकेले में रखा जा सकता है। जेल मैन्युअल के प्रावधान के अनुसार फांसी की सजा पाए अभियुक्तों को 24 घंटे में से 23 घंटे अलग रखने का प्रावधान अपने आप में दूसरी सजा से कम नहीं है।
वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति अलोक सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार सुशील उर्फ भूरा और मेहताब ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर स्पेशल जज एससी-एसटी एक्ट देहरादून के 27 जनवरी 2014 के आदेश को चुनौती दी थी जिसमें अभियुक्तों को गैंगरेप कर हत्या करने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई थी।
बता दें कि विकास नगर निवासी व्यक्ति ने 29 दिसंबर 2012 को विकास नगर थाने में एफआईआर दर्ज कर कहा था कि उसकी 55 वर्षीय मां बकरियों को चराने के लिए जंगल गई थी, लेकिन वह वापस नहीं आई। उनकी काफी खोजबीन करने पर उनका शव जंगल में मिला और उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ था। इस प्रकरण पर स्पेशल जज देहरादून ने 27 जनवरी 2014 को आईपीसी की धारा 302 व 376 जी के तहत निर्मम हत्या करने व दुष्कर्म करने के आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी। इसी को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
फांसी की सजा पाए अभियुक्तों को तन्हाई में रखना असंवैधानिक
हाईकोर्ट ने गैंगरेप व हत्या के आरोपी की फांसी की सजा बरकरार रखी