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मुख्य सचिव सहित सभी पक्षकारों को जवाब देने के निर्देश

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नैनीताल। उच्च न्यायालय ने प्रदेश में जैव चिकित्सीय कचरे के निस्तारण के मामले में सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने शुक्रवार को प्रदेश के मुख्य सचिव, केंद्रीय सचिव पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, केंद्रीय पर्यावरण प्रदूषण परिषद, प्रमुख सचिव, सचिव, सभी जिलों के जिलाधिकारियों, सभी जिलों के मुख्य विकास अधिकारियों, मुख्य चिकित्सा अधिकारियों , उत्तराखंड राज्य पर्यावरण नियंत्रण प्रदूषण परिषद व संबंधित अधिकारियों, ग्लोबल एजेंसी सहित अन्य को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
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मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। नैनीताल निवासी करन कुमार ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि जैव चिकित्सीय कचरे का निस्तारण जैव चिकित्सीय कचरा प्रबंधन नियमावली 2016 के तहत किया जाना चाहिए। हालात यह हैँ कि कचरे को राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे, खुले मैदानों, नदियों में फेंका जा रहा है। इससे जनमानस के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है। शासन में बैठे अधिकारी इसकी अनदेखी कर इसका समाधान तक नहीं कर रहे हैं। राज्य में स्थित सरकारी, गैर सरकारी, पशु चिकित्सालय, निजी क्लीनिक, पैथोलॉजी लैब, पशु वधशाला इत्यादि की ओर से नियमावली का पालन नही किया जा रहा हैं। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना में केवल 23 सरकारी अस्पताल ही मानकों का पालन कर रहे हैं। याचिका में तत्काल प्रभाव से जैव चिकित्सीय कचरे के निस्तारण के लिए नियमानुसार कदम उठाए जाने और इसके लिए वार्षिक अनुदान की व्यवस्था करने का आग्रह किया गया। खंडपीठ ने सभी 56 बने पक्षकारों को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।

मुख्य सचिव, केंद्रीय संस्थाओं सहित 56 को जारी किया नोटिस
चार सप्ताह में मांगा जवाब, नैनीताल निवासी की याचिका पर हुई सुनवाई

नियम हैं, पर पालन नहीं होता
जैव चिकित्सीय कचरे के प्रबंधन पर अमर उजाला की पड़ताल में उभरा था सच
एक साथ 56 को पक्षकार बना कर उच्च न्यायालय ने दिया मामले को गंभीरता से लेने का संकेत
हल्द्वानी। आखिरकार जैव चिकित्सीय कचरे के निस्तारण का मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच ही गया। एक साथ 56 को पक्षकार बना कर उच्च न्यायालय ने भी मामले को गंभीरता से लेने का संकेत दे दिया है। अमर उजाला इस मामले को प्रमुखता से उठाता भी रहा है। हमारी पड़ताल में यह भी साबित हुआ था कि यह मामला केवल एक विभाग या सिर्फ सरकार से संबंधित नहीं है। जैव चिकित्सीय कचरे के उचित निस्तारण के लिए सभी का अपने-अपने स्तर पर काम करना जरूरी है।
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जैव चिकित्सीय कचरे के उचित प्रबंधन के लिए कुछ समय पहले ही केंद्र सरकार ने नियमों में बदलाव भी किया था। यह महसूस किया जा रहा था कि नियमों को और अधिक व्यापक करने की जरूरत है। अमर उजाला की पड़ताल से यह भी सामने आया है कि नियमों के होते हुए भी जैव चिकित्सीय कचरे के निस्तारण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। यह मामला अस्पतालों, निगम और स्थानीय प्रशासन, शासन से लेकर कबाड़ का व्यवसाय करने वालों के बीच में उलझ कर रह गया। अमर उजाला की पहल पर अस्पताल के संचालकों से भी बातचीत की गई और इस बातचीत में यह खुलकर सामने आया कि कोई भी पक्ष इस मामले को लेकर भी पूरी तरह से संजीदा नहीं है। यही हाल प्रदेश के अन्य जिलों का भी है। कई जगह तो यह तक स्पष्ट नहीं है कि कितना जैव चिकित्सीय कचरा उत्पन्न हो रहा है। सामान्य कचरे के निस्तारण तक के लिए पहाड़ के जिले जूझ रहे हैं। ऐसे में जैव चिकित्सीय कचरे का प्रबंधन पूरी तरह से संबंधित संस्थाओं की नजर से ओझल हैँ।
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