रामनगर (नैनीताल)। कार्बेट लैंडस्केप में बाघों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसके बावजूद कार्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) से बाहर के प्रभागों में वन्यजीव सुरक्षा के नाम पर बजट ही नहीं मिलता। इस कारण विभाग को बाघों की सुरक्षा के लिए हर मोर्चे पर संघर्ष करना पड़ रहा है।
सीटीआर के निदेशक सुरेंद्र मेहरा बताते हैं बाघ बढ़ने के साथ ही इनके संरक्षण की चुनौती भी बढ़ रही है। उन्होंने इसके लिए कई उपाय सुझाए। बताया कि फायर सीजन में आग बुझाने का अलग विभाग होना चाहिए। इसके लिए जरूरी संसाधन भी जुटाए जाने चाहिए। विसरा रिपोर्टों की जांच में भी बड़ी परेशानी होती है। उनके शरीर के सैंपल देहरादून, बरेली के लैबों में भेजे जाते हैं। अधिक दूरी के कारण कई नमूने सड़ जाते हैं। इन लैबों में ज्यादा जांच आने के कारण मौत के कारणों की जांच रिपोर्ट भी देर में मिल पाती है। रामनगर वन प्रभाग की डीएफओ नेहा वर्मा ने भी माना कि बाघों की सुरक्षा के लिए टैरिटोरियल डिवीजनों में वन्यजीव संरक्षण के लिए अलग से बजट मिलना चाहिए। संसाधनों की कमी के कारण घायल बाघ पकड़ने के लिए दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। घायल वन्यजीवों के इलाज के लिए भी विशेष सुविधा की दरकार है।