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उतराखंड की तीजन बाई थीं स्वर कोकिला कबूतरी देवी

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कबूतरी देवी की फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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हल्द्वानी। ‘आज पाणि झौं-झौं, भोल पाणि झौं-झौं, पोरखिन त न्है जूंला’, ‘पहाड़ों को ठंडो पाणि, कि भलि मीठी बाणी’ और ‘हिमाला ह्यूं को फूलो, पातल क्वैराल फूलो, पहाड़ न्है जूनो’, ‘बाट में दुकान हाली, बटुआ लूटी खान्या, यो पराणि हवा जैसी, भोल त मरि जाणा’ जैसे लोक गीतों से धूम मचाने वाली कुमाऊंनी लोकगीतों की पहली लोक गायिका और कुमाऊंनी लोकगीतों की साम्राज्ञी स्वर कोकिला कबूतरी देवी को कुमाऊं के पारंपरिक लोकगीत ऋतुरैंण, चैतोल, न्यौली में महारत हासिल थी। उनके निधन के साथ ही पारंपरिक लोक गायकी ऋतुरैंण, चैतोल के एक युग का अंत हो गया।
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कबूतरी देवी ने न तो स्कूली शिक्षा ली और न ही किसी संगीत घराने और संस्थान से उन्होंने लोक संगीत की शिक्षा ली। घर पर ही माता-पिता ने इन्हें लोक संगीत की शिक्षा दी। कुदरत से ही उन्हें स्वर कोकिला कंठ मिला था। लोक परंपरा के लोकगीतों को गाने की शौकीन कबूतरी को माता-पिता ने बचपन में रागों का बोध कराया। खेलने की उम्र में ही उन्होंने हारमोनियम पर अपनी अंगुलियां चलानी शुरू कर दीं। पति ने उनके मधुर कंठ की वजह से उन्हें प्रेरित किया और आकाशवाणी तक पहुंचाया। उत्तराखंड में पुरुष गायकी की परंपरा को तोड़ने वाली कबूतरी देवी को उत्तराखंड की पहली महिला लोक गायिका होने का गौरव मिला। मोहन सिंह रीठागाड़ी, जीत सिंह नेगी, केशव अनुरागी, दीवान सिंह डोलिया, शिव प्रसाद पोखरियाल, पातीराम नौटियाल, हरदा सूरदास, गोपाल बाबू गोस्वामी, नरेंद्र सिंह नेगी, हीरा सिंह राणा, चंद्र सिंह राही, बीना तिवारी, नईमा खान जैसे उत्तराखंड के महान लोक कलाकारों की श्रेणी में शुमार कबूतरी देवी लोक परंपरा की प्रसिद्ध गायिका थीं। 28 मई 1979 में आकाशवाणी लखनऊ में उन्होंने स्वर परीक्षा उत्तीर्ण की और अपनी सुरीली आवाज के कारण आकाशवाणी और दूरदर्शन में छा गईं। विकट परिस्थिति में इनके सधे हुए स्वर को फिर से जीवंत करने के लिए ‘युगमंच’ नैनीताल के निर्देशक जहूर आलम, महिलाओं की प्रतिनिधि पत्रिका ‘उत्तरा’ की संपादक डॉ. उमा भट्ट, डॉ. बसंती पाठक, पहाड़ संस्था के डॉ. शेखर पाठक ने कबूतरी की मदद के हाथ बढ़ाए। इनमें भी सबसे बढ़कर कबूतरी की मदद को आगे आए जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा।’ बाद में नवोदय पर्वतीय कला केंद्र के संस्थापक हेमराज बिष्ट ने पिथौरागढ़ में ‘छोलिया महोत्सव’ के द्वारा उनकी पारंपरिक लोक कला को आगे बढ़ाने में उनका साथ दिया।


उत्तराखंड की ‘तीजन बाई’ नाम से प्रसिद्ध थीं लोक गायिका देवी
आज पाणि झौं-झौं और ‘पहाड़ों को ठंडो पाणि’ गीतों से आकाशवाणी में मचाई थी धूम
कबूतरी देवी के निधन के साथ ही पारंपरिक लोक गायकी के एक युग का अंत

लोक गायक, गयिका थे माता-पिता
कबूतरी देवी के पिता देवी राम लोक वादक, वादक और माता देवकी देवी लोक गायिका थीं। उन्हें लोक गायन माता-पिता से विरासत में मिला था। माता-पिता ही उनके गुरु थे।
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... तू वसंत पंचमी को पैदा हुई
बताते हैं कि कबूतरी देवी अपने जन्म की तिथि ठीक से नहीं बता पाती थीं। जन्मतिथि के बारे में वह कहती थीं ‘मां ने मुझे बताया था कि तू वसंत पंचमी के दिन पैदा हुई, उस दिन बहुत ठंड थी।’ हालांकि उनका जन्म 18 जनवरी 1945 में हुआ था।

कबूतरी देवी को इन्होंने किया सम्मानित
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली, उत्तराखंड लोक भाषा मंच नई दिल्ली, पर्वत जन प्रकाशन समूह देहरादून, ‘पहाड़ संस्था’, मोहन उप्रेती लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति अल्मोड़ा, यंग उत्तराखंड साइन, छोलिया महोत्सव समिति पथिौरागढ़, नगर पालिका अल्मोड़ा, नगर पालिका पिथौरागढ़, उत्तराखंड महापरिषद लखनऊ।
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कबूतरी का जीवन चक्र
- कबूतरी का जन्म क्वीतड़ (पिथौरागढ़) में 18 जनवरी 1945 को।
- विवाह 1959 में लोक गायक वादक दीवानी राम के साथ 14 वर्ष की उम्र में।
- 30 दिसंबर 1984 को कबूतरी के पति दीवानी राम का निधन।
- आकाशवाणी लखनऊ से पहली बार प्रसारण 25 मई 1979 में।
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